|| श्री बटुक भैरव स्तोत्र ||
|| श्री बटुक भैरव स्तोत्र || ।। पूर्व-पीठिका ।। मेरु-पृष्ठ पर सुखासीन, वरदा देवाधिदेव शंकर से – पूछा देवी पार्वती ने, अखिल विश्व-गुरु परमेश्वर से । जन-जन के कल्याण हेतु, वह सर्व-सिद्धिदा मन्त्र बताएँ – जिससे सभी आपदाओं से साधक की रक्षा हो, वह…
|| गर्भऽर्गला ||
|| गर्भऽर्गला || ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः, ॐ एतत् ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितम् । पातु नः सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोस्तुऽते, मः न च्चे वि यै डा मुं चा क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। १ ।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः, ज्वालाकराल…
|| श्री गुरुस्तोत्रम् ||
|| श्री गुरुस्तोत्रम् || श्री गुरुस्तोत्रम्: गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१॥…
|| शिव ताण्डव स्तोत्रम् ||
|| शिव ताण्डव स्तोत्रम् || ये वो शिव-ताण्डव-स्तोत्रम् है जिसे पढ़ कर रावण ने महादेव को प्रसन्न कर लिया था जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् | डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वय चकार…
|| सिद्धकुञ्चिकास्तोत्रम् ||
|| सिद्धकुञ्चिकास्तोत्रम् || शिव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥1॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न…
|| श्री शिवरक्षा स्तोत्रम् ||
|| श्री शिवरक्षा स्तोत्रम् || । ॐ नमः शिवाय । अस्य श्रीशिवरक्षा-स्तोत्र-मन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः, श्रीसदाशिवो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीसदाशिव-प्रीत्यर्थे शिवरक्षा-स्तोत्र-जपे विनियोगः ॥ चरितं देवदेवस्य महादेवस्य…
श्री गोरख नाथ चालीसा
दोहा गणपति गिरजा पुत्र को सुमिरु बारम्बार | हाथ जोड़ बिनती करू शारद नाम आधार || चोपाई जय जय जय गोरख अविनाशी | कृपा करो गुरुदेव प्रकाशी || जय जय जय गोरख गुण ज्ञानी | इच्छा रूप योगी वरदानी || अलख निरंजन तुम्हरो नामा | सदा…
वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये – ५
गायत्री विद्या को प्राण तत्व के अभिवर्धन का आधारभूत साधना माना गया है। उसका तत्त्व दर्शन और उपासना प्रकरण दोनों ही इस आवश्यकता की पूर्ति करते है। भौतिक विज्ञान के सहारे आत्मिक विशिष्टताओं को उभारा और सुदृढ़ किया जा सकता है। आत्मिक क्षेत्र में प्राण शक्ति…
वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये – ४
कृषि, व्यवसाय, शिल्प, कला आदि के सभी क्षेत्रों में अथक परिश्रम, प्रचण्ड- साहस, सन्तुलित विवेक और समुचित धैर्य की आवश्यकता होती है। आलसी, प्रमादी अधीर और आशंकाग्रस्त मनुष्य सामान्य सांसारिक प्रयोजनों तक में सफल नहीं हो पाते। आन्तरिक दुर्बलताएँ अपनी सहेली…
वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये – ३
कुटिलता के बल पर नहीं, प्रगति सदाशयता और सज्जनता की नीति अपनाने से ही सम्भव होती है। सृजन की सामर्थ्य ही वास्तव शक्ति है। उसी को विकसित करके मनुष्य गुण, कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता प्राप्त करता है। व्यक्तित्व को निखारने और सुसंस्कृत बनाने के प्रयत्न ही…