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वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये – ३

By hariomoberthur@gmail.com
May 21, 2017 3 Min Read
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कुटिलता के बल पर नहीं, प्रगति सदाशयता और सज्जनता की नीति अपनाने से ही सम्भव होती है। सृजन की सामर्थ्य ही वास्तव शक्ति है। उसी को विकसित करके मनुष्य गुण, कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता प्राप्त करता है। व्यक्तित्व को निखारने और सुसंस्कृत बनाने के प्रयत्न ही किसी मनुष्य में समर्थ सशक्ता उत्पन्न करते हैं। उसी से गरिमा बढ़ती है। सृजनात्मक प्रयोजनों में यही क्षमता काम आती है। लोकहित उसी से सम्भव होता है। सेवा साधना उसी के सहारे बन पड़ती है। लोक- सम्मान से लेकर आत्म- सन्तोष तक के अनेकानेक वरदान उसी के सहारे उपलब्ध होते हैं भविष्य निर्माण का एकमात्र उपाय आत्म- निर्माण ही माना गया है। संचित कुसंस्कारों से जूझना उन्हें उखाड़ फेंकना प्रबल पुरुषार्थ कहा जाता है। दूसरों से लड़ने की अपेक्षा अपने से लड़ना आन्तरिक शत्रुओं को परास्त करना अधिक कठिन है। आत्म- शोधन के मोर्चे पर लड़ना और विजय प्राप्त करना ब्राह्म जगत की किसी भी सफलता की तुलना नें अधिक श्रेयष्कर है। यह लडा़ई प्रचण्ड आत्म- बल के सहारे ही लडी़जा सकती है। ब्रह्मवर्चस् को उपार्जित करके मनुष्य सामान्य से असामान्य और नर से नारायण बनने का पथ- प्रशस्त करता है।
           बाह्य जीवन में श्रेय, सहयोग पाने के लिए बीज रूप से स्वयं गलना पड़ता है। परमार्थ प्रयोजनों में सच्चे मन से लग सकना उसी के लिए सम्भव हो सकता है जो अपनी तृष्णाओं पर अकुश लगा सके। महत्वाकांक्षाओं का दमन करने वाला अपनी क्षमताओं तथा आदर्शों की साधना में लगा सकता है। जो स्वयं ही आकांक्षाओं की आग में जल रहा है उसे तो दूसरों के ईंधन की तरह उपलब्ध करनें का ही मन रहेगा। जो अपने को बादल की तरह निचोड़ सके, वही किसी के कुम्हलाये पौधे को नव- जीवन दे सकने में समर्थ हो सकता है। स्वार्थों पर अकुश लगा सकना इस अहंलिप्सा के युग में कितना कठिन है यह किसी से छिपा नहीं। नदी प्रवाह से ठीक उलटी दिशा में केवल साहसी मछली ही छरछराती हुई चल सकती है। हाथी जैसे विशालकाय प्राणी तक उसमें बहते चले जाते हैं। मछली जैसी प्रवाह के विपरीत चलने की साहसकिता निस्सन्देह असाधारण ही कही जा सकती है। ऐसा अद्भुत शौर्य, साहस प्रदर्शित कर सकने वाले एतिहासिक महामानव कहलाते और युग समस्याओं को सुलझाते हैं। यह गौरव प्राप्त करने की मनःस्थिति और परिस्थिति बना सकना केवक उन्हीं के लिए सम्भव होता है जो आत्म- बल का महत्त्व समझते और उसे उपलब्ध करने का प्रयत्न करते हैं। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलना, लोक मान्यता के अनुसार घाटे का काम है। इसलिए तथाकथित स्वजन सम्बन्धी एक स्वर से उधर कदम बढा़ने से चित्रविचित्र तर्क गढ़कर रोकते हैं। शत्रुओं का प्रतिरोध सरल है, पर स्वजनों के आग्रह को अनसुना करने वाली एकाग्र आदर्श- निष्ठा का परिचय दे सकना अति दुस्तर है। इस अग्नि परीक्षा में सफल हो सकना आत्म- बल के बिना सम्भव नहीं हो सकता। आन्तरिक प्रलोभनों और परिजनों के आग्रहों की उपेक्षा कर सकना जिस प्रचण्ड आदर्शवादिता के सहारे सम्भव होता है वह आत्म- बल का ही दूसरा रूप है।
           व्यक्तित्व के परिष्कार और देवताओं जैसा लोक- व्यवहार ही मानव जीवन की सफलता का एकमात्र आधार है। वह उत्कृष्टता के प्रति असीम श्रद्धा रख सकने पर ही सम्भव होता है। आये दिन के आँधी- तूफानों से ज्वार- भाटों से आत्मवादी दृष्टिकोण के दीपक को बुझने न देना भँवर से नाव खेकर ले जाने की तरह कठिन है। यह भव- बन्धनों को लौह श्रृंखला को अपने ही नाखूनों से काटने जैसी कठिन प्रक्रिया है। इसे अटूट धैर्य और असीम साहस के सहारे ही सम्पन्न किया जा सकता है। मानवी- गरिमा को प्राप्त कर सकने की ललक तो बहुतों की रहती है, पर उसे पा सकने में आत्म- बल सम्पन्न शूर- वीन ही सफल होते हैं।
           भौतिक जीवन में चिरस्थायी सफलताएँ प्राप्त करने के लिर आत्म- बल की, संकल्प बल की आवश्यकता पड़ती है। विद्यार्थियों में से अनेकों को अरुचि और अवारागर्दी की आदत मूर्खता औरपिछडे़पन की गर्त में फेंक देती है। साधन रहते हुए भी कितने ही लड़के पढ़ नहीं पाते और बेकार के बहाने बनाकर शिक्षा लाभ से वंचित रह जाते हैं। इस दुर्भाग्य से जूझ सकना मनस्वी और दूरदर्शी छात्रों के लिए ही सम्भव होता है। व्यायामशाला में क्षणिक उत्साह लेकर कितने ही प्रवेश करते हैं किन्तु उस कठिन मार्ग से खिन्न होकर जल्दी ही छोड़ भी बैठते हैं। नित नये कार्य आरम्भ करने वाले और कुछ ही समय में उसे छोड़ बैठने वाले नर- वानरों की बहुत बडी़ मण्डली सर्वत्र विचरती देखी जा सकती

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