Category शिक्षाप्रद कथाएँ

मंदिरों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य: सनातन धर्म में क्यों हैं इतने मंदिर?

सनातन धर्म में मंदिर केवल पूजा करने का स्थान नहीं होते, बल्कि वे आध्यात्मिक ऊर्जा, चेतना और सकारात्मक कंपन के केंद्र माने जाते हैं। प्राचीन भारत में मंदिरों का निर्माण केवल धार्मिक आस्था के लिए नहीं, बल्कि मानव मन, शरीर…

चाणक्य नीति : सत्रहवां अध्याय |

यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटा भसमलेपनैः॥ भावार्थ : जिस मनुष्य का हृदय सभी प्राणियों के लिए दया से द्रवीभूत हो जाता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जता, भष्म – लेपन आदि से क्या लेना ।…

चाणक्य नीति : सोलहवां अध्याय |

अनवस्थितकायस्य न जने न वने सुखम्। जनो दहति संसर्गाद् वनं सगविवर्जनात॥ भावार्थ : जिसका चित्त स्थिर नहीं होता, उस व्यक्ति को न तो लोगों के बीच में सुख मिलता है और न वन में ही । लोगो के बीच में…

चाणक्य नीति : पन्द्रहवां अध्याय |

गतं शोको न कर्तव्यं भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः॥ भावार्थ : बीती बात पर दुःख नहीं करना चाहिए । भविष्य के विषय में भी नहीं सोचना चाहिए । बुद्धिमान लोग वर्तमान समय के अनुसार ही चलते हैै ।…

चाणक्य नीति : चौदहवां अध्याय |

रङ्कं करोति राजानं राजानं रङ्कमेव च। धनिनं निर्धनं चैव निर्धनं धनिनं विधिः॥ भावार्थ : भाग्य रंक को राजा और राजा को रंक बना देता है । धनी को निर्धन तथा निर्धन को धनी बना देता है । येषां न विद्या…

चाणक्य नीति : तेरहवां अध्याय |

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्वया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥ भावार्थ : विद्वान की लोक में प्रशंसा होती है, विद्वान को सर्वत्र गौरब मिलता है, विद्या से सब कुछ प्राप्त होता है और विद्या की सर्वत्र पूजा होती…

चाणक्य नीति : बारहवां अध्याय |

वाचा च मनसः शौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। सर्वभूतदया शौचमेतचछौचं परमार्थिनाम्॥ भावार्थ : मन, वाणी को पवित्र रखना, इंद्रियों को निग्रह, सभी प्राणियों पर दया करना और दूसरों का उपकार करना सबसे बड़ी शुद्धता है । अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः। उत्तमा…

चाणक्य नीति : ग्यारहवां अध्याय |

सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च। न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावाताम्॥ भावार्थ : सन्तोष के अमृत से तृप्त व्यक्तियों को जो सुख और शान्ति मिलता है, वह सुख- शान्ति धन के पीछे इधर-उधर भागनेवालों को नहीं मिलती । सन्तोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने।…

चाणक्य नीति : दसवां अध्याय |

लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्खश्छन्दानुरोधेन यथार्थवादेन पण्डितम्॥ भावार्थ : लालची को धन देकर, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मुर्ख को उपदेश देकर तथा पण्डित को यथार्थ बात बताकर वश में करना चाहिए । कुराजराज्येन कृतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिवृत्तिः। कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कृशिष्यमध्यापयतः…

चाणक्य नीति : नवां अध्याय |

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः। सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥ भावार्थ : सत्य ही पृथ्वी को धारण करता है । सत्य से ही सूर्य तपता है । सत्य से ही वायु बहती है । सब कुछ सत्य में…