वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये – ५

गायत्री विद्या को प्राण तत्व के अभिवर्धन का आधारभूत साधना माना गया है। उसका तत्त्व दर्शन और उपासना प्रकरण दोनों ही इस आवश्यकता की पूर्ति करते है। भौतिक विज्ञान के सहारे आत्मिक विशिष्टताओं को उभारा और सुदृढ़ किया जा सकता है। आत्मिक क्षेत्र में प्राण शक्ति भर देने की विद्या को गायत्री कहा गया है।

सैषा गायत्री प्राणः अतो गायत्र्यां जगत्प्रतिष्ठतम्यास्मिन् प्राणे सर्व देवा एक भवन्ति। सर्वे वेदाकर्मांणि तत्फलं च, सैव गायत्री प्राण रूपा सती जगत आत्मा सा हैषा गयांस्तत्रेत्नातवति, केपुनर्गयाः? प्राणाः वागादयो वैभवा””””””गयत्राणाद् गायत्रीति प्रथिता

अर्थात् यह गायत्री ही प्राण है। अतः वही समस्त विश्व में व्याप्त है। इस प्राण में ही समस्त देवता सन्निहित हैं। यह प्राण रूप गायत्री ही जगत की आत्मा है। वाणी नेत्र आदि समस्त इन्द्रियों में समाविष्ट प्राण की संरक्षक होने के कारण उसे गायत्री कहा जाता है।

प्राणो
वै बलं। यत्प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलं
सत्यादोजीयः इत्येवम्वैषा गायत्र्यध्यात्म प्रतिष्ठिता।
साह्यौषा गयांस्तत्रेप्राणा वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रेतद्यद्
गयांस्तत्रे गायत्री नाम् ।।
अर्थात्-  प्राण ही बल है। बल और प्राण एक ही है। परब्रह्म प्राणों का भी प्राण है। गायत्री का अध्यात्म यह प्राण ही है। प्राणों का परिष्कार करने की शक्ति सम्पन्न होने के कारण उसे गायत्री नाम दिया गया है।

प्राण शक्ति की आत्म- बल की अभिवृद्धि सामान्य मनुष्य में असामान्य क्षमताएँ विकसित करती है। उसे मूर्च्छित से जाग्रत बनाती है। आन्तरिक समर्थता से सम्पन्नं मनुष्य भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्र में सर्वतोन्मुखी प्रगति कर संकने में सफल बन सकता है।
           गायत्री विद्या की उच्च स्तरीय साधना से प्राणशक्ति की अभिवृद्धि होती है। अस्तु, उसके प्रभाव परिणाम को ब्रह्मवर्चस् कहा जाता है। गायत्री के वरदान ब्रह्मवर्चस् को प्राप्त कर सकने वाला हर क्षेत्र में विभूतिवान बनता है। इस तथ्य का प्रतिपादन छान्दोग्य उपनिषद में इस प्रकार मिलता है-

स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोत वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिभर्वंतिमहान्कीर्त्यां महामनः स्यात्तद्व्रतम्।
अर्थात्- यह गायत्री तत्व समस्त प्राणों में विद्यमान है। जो उसकी उपासना करता है वह विद्वान, प्राणवान्, दीर्घजीवी, यशस्वी, सुसम्पन्न्, उदार और महामानवी बनता है।
           वर्चस् की आत्मबल की आवश्यकता हर क्षेत्र में है। भौतिक किन्तु आध्यात्मिक। आत्मबल जिस प्राणशक्ति के सचंय से संपादित होता है, वह गायत्री महाशक्ति का अवलम्बन लेकर अर्जित की जा सकती है। गायत्री की प्रेरणा से आत्मबल ब्रह्मवर्चस् इसी तरह उभरता है, जैसे कि सौर मण्डल के ग्रह- उपग्रह सूर्य की आभा से प्रकाशवान दिखाई देते हैं। जीवन को जीवितों की तरह प्राणवानों की तरह, जीना हो, उसमें कुछ रस लेना हो आनन्द लेना हो, सोद्देश्य जीवन जीकर आर्जित करना हो तो आत्मबल ही संपादित किया जाना चाहिए। बलिष्ठता की अनुगामिनी ही सम्पन्नता है। अस्तु, बलों मेंपरमबल के उपार्जन को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए हम ‘वर्चस्’ की उपासना करें, गायत्री का ब्रह्मतेज धारण कर प्राणवान बनें, इसी में दूरदर्शिता है।

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