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वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये – ४

By hariomoberthur@gmail.com
May 21, 2017 3 Min Read
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कृषि, व्यवसाय, शिल्प, कला आदि के सभी क्षेत्रों में अथक परिश्रम, प्रचण्ड- साहस, सन्तुलित विवेक और समुचित धैर्य की आवश्यकता होती है। आलसी, प्रमादी अधीर और आशंकाग्रस्त मनुष्य सामान्य सांसारिक प्रयोजनों तक में सफल नहीं हो पाते। आन्तरिक दुर्बलताएँ अपनी सहेली असफलताओं को निमंत्रण दे देकर बुला लाती हैं। व्यक्तित्व का परिष्कार ही सही- लोक श्रद्धा और आत्म- सन्तोष देने वाली महानता न सही- स्वार्थ साधना की दृष्टि से सम्पन्नता और सफलता तो हर किसी को अभीष्ट है ही। उसका आधार भी मनोबल बिना नहीं बनता। जहाँ इसका अभाव होगा वहाँ न स्वार्थ सधेगा और न परमार्थ। आन्तरिक अशक्ति हो बाह्य जीवन में अभिशाप ही बरसाती है। ऐसे व्यक्ति अपंग, असहाय की तरह जीते और रोते- कलपते बेमौत मरते हैं। आत्मबल का अभाव इतनाबडा़ दुर्भाग्य है कि इसके कारण पग- पग पर खिन्नता, उद्विग्नता की व्यथा सहन करनी पड़ती है। ऐसे लोगों का न लोक सधता है, न परलोक। उनका ना स्वार्थ सिद्ध होता है न परमार्थ बनता है।
          परिस्थितियों का अपना कोई अस्तित्व नहीं, वे मनःस्थिति के अनुरूप बनती हैं। अप्रत्याशित कोई प्रतिकूलता सामने आ खडी़ हो तो भी वे देर तक ठहरती नहीं। रोग कीटाणु अशुद्ध रक्त में ही अपना अड्डा जमा पाते हैं। शुद्ध रक्त तो उन्हें बात की बात में खदेड़ कर बाहर कर देता है। प्रतिकूल परिस्थितियाँ मनःस्थिति के वृक्ष पर ही अमरवेल की तरह छाई और फलती- फूलती रहती हैं। महामानवों की जीवन- गाथाओं पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि उनमें से कोई भी जन्मजात एवं परम्परागत अनुकूलता लेकर नहीं जन्मा। हर एक को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। लोगों ने उनको कन्धे पर नहीं चढा़या, वरन् वे स्वयं ही अपनी विशेषताओं के आधार पर हर किसी की आँखों के तारे बने और हृदयों में जा विराजे हैं। अनुकूलताएँ बरसी नहीं, वरन् अपने हाथों उनने उन्हें गढा़ है। चलना अपने ही पैरों पड़ता है, दूसरों के कन्धों पर लद कर चल सकना किसके लिए कब तक सम्भव हो सकता है?
          आत्म- बल की आवश्यकता हर क्षेत्र में है आत्म- बल उसकी प्रेरणा से उसी तरह उभरते हैं जैसे सौर- मंडल के ग्रह- उपग्रह सूर्य की आभा से प्रकाशवान् दीखते हैं। जीवन को जीवितों की तरह जीना हो तथा उसमें कुछ और आनन्द लेना हो तो आत्म- बल सम्पादित करने की उपेक्षा की नहीं जा सकती। बलिष्ठता की अनुगामिनी ही सम्पन्नता है। अस्तु, बलों में परम बल आत्म- बल के ब्रह्यवर्चस्उपार्जन को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
           शास्त्रकारों ने ‘बल उपास्य’ का निर्देश इसीलिए दिया और कहा है कि आत्मोत्कर्ष का लाभबलहीनों को नहीं मिल सकता। सच भी है बलहीनों को न आत्मा मिल सकेगी और न परमात्मा। भौतिक जीवन में उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता। इस संसार के बाजार में सम्पदाएँ विभूतियाँ और उपलब्धियाँ समर्थता के मूल्य पर ही खरीदी  जाती हैं।
          जीवन की सार्थकता ‘जीवित’ के साथही है। जीवनी शक्तियुग को ही जीवित कहा जा सकता है। इसके अभाव में मनुष्य को जीवित मृतक ही कहा जा सकता है। खाने सोने की प्रक्रिया तो पेड़- पौधे भी पूरी करते हैं। जीवाणुओं में भी गतिशीलता होती है। पर उन्हें जीवितों का श्रेय सम्मान तो नहीं मिलता।
           चेतना की बलिष्ठता को अध्यात्म की भाषा में प्राण के नाम से पुकारा जाता है। प्राण अर्थात् जीव आत्मा की वह क्षमता है जो शरीर में ओजस् चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं वर्चस् के नाम से जानी जाती है। इस अंतःक्षमता को, आत्मशक्ति को प्राण तत्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने वाला ही जीवन का आनन्द लेता और उसे सार्थक बनाता है।

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hariomoberthur@gmail.com

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