मंत्र पुष्पांजली
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्| ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा: ॐ राजाधिराजाय प्रसह्ये साहिने | नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे स मे कामान्कामकामाय मह्यम्| कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु| कुबेराय वैश्रवणाय | महाराजाय नम: ॐ…
चाणक्य नीति : प्रथम अध्याय |
चाणक्य नीति : प्रथम अध्याय १. तीनो लोको के स्वामी सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु को नमन करते हुए मै एक राज्य के लिए नीति शास्त्र के सिद्धांतों को कहता हूँ. मै यह सूत्र अनेक शास्त्रों का आधार ले कर कह रहा हूँ। 2. जो…
बत्तीसवीं पुतली ~ रानी रूपवती ~ अंतिम कहानी
बत्तीसवीं पुतली रानी रूपवती ने राजा भोज को सिंहासन पर बैठने की कोई रुचि नहीं दिखाते देखा तो उसे अचरज हुआ। उसने जानना चाहा कि राजा भोज में आज पहले वाली व्यग्रता क्यों नहीं है। राजा भोज ने कहा कि राजा विक्रमादित्य के देवताओं वाले गुणों की कथाएँ सुनकर…
इकत्तीसवीं पुतली ~ कौशल्या ~ विक्रमादित्य की मृत्यु
इकत्तीसवीं पुतली – कौशल्या ने अपनी कथा इस प्रकार कही- राजा विक्रमादित्य वृद्ध हो गए थे तथा अपने योगबल से उन्होंने यह भी जान लिया कि उनका अन्त अब काफी निकट है। वे राज-काज और धर्म कार्य दोनों में अपने को लगाए रखते थे। उन्होंने वन में भी साधना के लिए…
तीसवीं पुतली ~ जयलक्ष्मी ~ मृग रूप से मुक्ति
तीसवीं पुतली – जयलक्ष्मी ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य जितने बड़े राजा थे उतने ही बड़े तपस्वी। उन्होंने अपने तप से जान लिया कि वे अब अधिक से अधिक छ: महीने जी सकते हैं। अपनी मृत्यु को आसन्न समझकर उन्होंने वन में एक कुटिया बनवा ली…
उन्तीसवीं पुतली ~ मानवती ~ राजा विक्रम की बहन की शादी
उन्तीसवीं पुतली – मानवती ने इस प्रकार कथा सुनाई- राजा विक्रमादित्य वेश बदलकर रात में घूमा करते थे। ऐसे ही एक दिन घूमते-घूमते नदी के किनारे पहुँच गए। चाँदनी रात में नदी का जल चमकता हुआ बड़ा ही प्यारा दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। विक्रम चुपचाप नदी तट पर…
अट्ठाईसवीं पुतली ~ वैदेही ~ स्वर्ग की यात्रा
अट्ठाईसवीं पुतली का नाम वैदेही था और उसने अपनी कथा इस प्रकार कही- एक बार राजा विक्रमादित्य अपने शयन कक्ष में गहरी निद्रा में लीन थे। उन्होंने एक सपना देखा। एक स्वर्ण महल है जिसमें रत्न, माणिक इत्यादि जड़े हैं। महल में बड़े-बड़े कमरे हैं जिनमें सजावट की…
सताइसवीं पुतली – मलयवती ~ विक्रमादित्य और दानवीर राजा बलि
सताइसवीं पुतली – मलयवती नाम की सताइसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है- विक्रमादित्य बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा था और राज-काज चलाने में उनका कोई सानी नहीं था। वीरता और विद्वता का अद्भुत संगम थे। उनके शस्त्र ज्ञान और शास्त्र ज्ञान की कोई…
छब्बीसवीं पुतली – मृगनयनी ~ रानी का विश्वासघात
छब्बीसवीं पुतली – मृगनयनी नामक छब्बीसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है: राजा विक्रमादित्य न सिर्फ अपना राजकाज पूरे मनोयोग से चलाते थे, बल्कि त्याग, दानवीरता, दया, वीरता इत्यादि अनेक श्रेष्ठ गुणों के धनी थे। वे किसी तपस्वी की भाँति अन्न-जल…
पच्चीसवीं पुतली – त्रिनेत्री ~ ईश्वर से आस
पच्चीसवीं पुतली – त्रिनेत्री नामक पच्चीसवीं पुतली की कथा इस प्रकार है: राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा के सुख दुख का पता लगाने के लिए कभी-कभी वेश बदलकर घूमा करते थे तथा खुद सारी समस्या का पता लगाकर निदान करते थे। उनके राज्य में एक दरिद्र ब्राह्मण और…