Skip to content
-
Subscribe to our newsletter & never miss our best posts. Subscribe Now!
  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
Subscribe
Close

Search

Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Uncategorized

सताइसवीं पुतली – मलयवती ~ विक्रमादित्य और दानवीर राजा बलि

By hariomoberthur@gmail.com
January 31, 2017 6 Min Read
0
सताइसवीं पुतली – मलयवती नाम की सताइसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है-
विक्रमादित्य बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा था और राज-काज चलाने में उनका कोई  सानी नहीं था। वीरता और विद्वता का अद्भुत संगम थे। उनके शस्त्र ज्ञान और शास्त्र ज्ञान की कोई सीमा नहीं थी। वे राज-काज से बचा समय अकसर शास्त्रों के अध्ययन में लगाते थे और इसी ध्येय से उन्होंने राजमहल के एक हिस्से में विशाल पुस्तकालय बनवा रखा था। वे एक दिन एक धार्मिक ग्रन्थ पढ़ रहे थे तो उन्हें एक जगह राजा बलि का प्रसंग मिला। उन्होंने राजा बलि वाला सारा प्रसंग पढ़ा तो पता चला कि राजा बलि बड़े दानवीर और वचन के पक्के थे। वे इतने पराक्रमी और महान राजा थे कि इन्द्र उनकी शक्ति से डर गए। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे बलि का कुछ उपाय करें तो विष्णु ने वामन रूप धरा। वामन रूप धरकर उनसे सब कुछ दान में प्राप्त कर लिया और उन्हें पाताल लोक जाने को विवश कर दिया।
जब उनकी कथा विक्रम ने पढ़ी तो सोचा कि इतने बड़े दानवीर के दर्शन ज़रूर करने चाहिए। उन्होंने विचार किया कि भगवान विष्णु की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया जाए तथा उनसे दैत्यराज बलि से मिलने का मार्ग पूछा जाए। ऐसा विचार मन में आते ही उन्होंने राज-पाट और मोह-माया से अपने आपको अलग कर लिया तथा महामन्त्री को राजभार सौंपकर जंगल की ओर प्रस्थान कर गए। जंगल में उन्होंने घोर तपस्या शुरु की और भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे। उनकी तपस्या बहुत लम्बी थी। शुरू में वे केवल एक समय का भोजन करते थे। कुछ दिनों बाद उन्होंने वह भी त्याग दिया तथा फल और कन्द-मूल आदि खाकर रहने लगे। कुछ दिनों बाद सब कुछ त्याग दिया और केवल पानी पीकर तपस्या करते रहे। इतनी कठोर तपस्या से वे बहुत कमज़ोर हो गए और साधारण रूप से उठने-बैठने में भी उन्हें काफी मुश्किल होने लगी। धीरे-धीरे उनके तपस्या स्थल के पास और भी बहुत सारे तपस्वी आ गए। कोई एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या करने लगा तो कोई एक हाथ उठाकर, कोई काँटों पर लेटकर तपस्या में लीन हो गया तो कोई गरदन तक बालू में धँसकर। चारों ओर सिर्फ ईश्वर के नाम की चर्चा होने लगी और पवित्र वातावरण तैयार हो गया।
विक्रम ने कुछ समय बाद जल भी लेना छोड़ दिया और बिलकुल निराहार तपस्या करने लगे। अब उनका शरीर और भी कमज़ोर हो गया और सिर्फ हड्डियों का ढाँचा न आने लगा। कोई देखता तो दया आ जाती, मगर राजा विक्रमादित्य को कोई चिन्ता नहीं थी। विष्णु की आराधना करते-करते यदि उनके प्राण निकल जाते तो सीधे स्वर्ग जाते और यदि विष्णु के दर्शन हो जाते तो दैत्यराज बलि से मिलने का मार्ग प्रशस्त होता। वे पूरी लगन से अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए तपस्यारत रहे। जीवन और शरीर का उन्हें कोई मोह नहीं रहा। राजा विक्रमादित्य का हुलिया ऐसा हो गया था कि कोई भी देखकर नहीं कह सकता था कि वे महाप्रतापी और सर्वश्रेष्ठ हैं।
राजा के समीप ही तपस्या करने वाले एक योगी ने उनसे पूछा कि वे इतनी घोर तपस्या क्यों कर रहे हैं। विक्रम का जवाब था- “इहलोक से मुक्ति और परलोक सुधार के लिए। तपस्वी ने उन्हें कहा कि तपस्या राजाओं का काम नहीं है। राजा को राजकाज के लिए ईश्वर द्वारा जन्म दिया जाता है और यही उसका कर्म है। अगर वह राज-काज से मुँह मोड़ता है तो अपने कर्म से मुँह मोड़ता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य को अपने कर्म से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। विक्रम ने बड़े ही गंभीर स्वर में उससे कहा कि कर्म करते हुए भी धर्म से कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। उन्होंने जब उससे पूछा कि क्या शास्त्रों में किसी भी स्थिति में धर्म से विमुख होने को कहा गया है तो तपस्वी एकदम चुप हो गया। उनके तर्कपूर्ण उत्तर ने उसे आगे कुछ पूछने लायक नहीं छोड़ा। राजा ने अपनी तपस्या जारी रखी। अत्यधिक निर्बलता के कारण एक दिन राजा बेहोश हो गए और काफी देर के बाद होश में आए। वह तपस्वी एक बार फिर उनके पास आया और उनसे तपस्या छोड़ देने को बोला। उसने कहा कि चूँकि राजा गृहस्थ हैं, इसलिए तपस्वियों की भाँति उन्हें तप नहीं करना चाहिए। गृहस्थ को एक सीमा के भीतर ही रहकर तपस्या करनी चाहिए।
जब उसने राजा को बार-बार गृहस्थ धर्म की याद दिलाई और गृहस्थ कर्म के लिए प्रेरित किया तो राजा ने कहा कि वे मन की शान्ति के लिए तपस्या कर रहे हैं। तपस्वी कुछ नहीं बोला और वे फिर तपस्या करने लगे। कमज़ोरी तो थी ही- एक बार फिर वे अचेत हो गए। जब कई घण्टों बाद वे होश में आए तो उन्होंने पाया कि उनका सर भगवान विष्णु की गोद में है। उन्हें भगवान विष्णु को देखकर पता चल गया कि तपस्या से रोकने वाला तपस्वी और कोई नहीं स्वयं भगवान विष्णु थे। विक्रम ने उठकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया तो भगवान ने पूछा वे क्यों इतना कठोर तप कर रहे हैं। विक्रम ने कहा कि उन्हें राजा बलि से भेंट का रास्ता पता करना है। भगवान विष्णु ने उन्हें एक शंख देकर कहा कि समुद्र के बीचों-बीच पाताल लोक जाने का रास्ता है। इस शंख को समुद्र तट पर फूँकने के बाद उन्हें समुद्र देव के दर्शन होंगे और वही उन्हें राजा बलि तक पहुँचने का मार्ग बतलाएँगे। शंख देकर विष्णु अंतध्र्यान हो गए। विष्णु के दर्शन के बाद विक्रम ने फिर से तपस्या के पहले वाला स्वास्थ्य प्राप्त कर लिया और वैसी ही असीम शक्ति प्राप्त कर ली।
शंख लेकर वे समुद्र के पास आए और पूरी शक्ति से शंख फूँकने लगे। समुद्र देव उपस्थित हुए और समुद्र का पानी दो भागों में विभक्त हो गया। समुद्र के बीचों-बीच अब भूमि मार्ग दिखाई देने लगा। उस मार्ग पर राजा आगे बढ़ते रहे। काफी चलने के बाद वे पाताल लोक पहुँच गए। जब वे राजा बलि के महल के द्वार पर पहुँचे तो द्वारापालों ने उनसे आने का प्रयोजन पूछा। विक्रम ने उन्हें बताया कि राजा बलि के दर्शन के लिए मृत्युलोक के यहाँ आए हैं। एक सैनिक उनका संदेश लेकर गया और काफी देर बाद उनसे आकर बोला कि राजा बलि अभी उनसे नहीं मिल सकते हैं। उन्होंने बार-बार राजा से मिलने का अनुरोध किया पर राजा बलि तैयार नहीं हुए।
राजा ने खिन्न और हताश होकर अपनी तलवार से अपना सर काट लिया। जब प्रहरियों ने यह खबर राजा बलि को दी तो उन्होंने अमृत डलवाकर विक्रम को जीवित करवा दिया। जीवित होते ही विक्रम ने फिर राजा बलि के दर्शन की इच्छा जताई। इस बार प्रहरी संदेश लेकर लौटा कि राजा बलि उनसे महा शिवरात्रि के दिन मिलेंगे। विक्रम को लगा कि बलि ने सिर्फ़े टालने के लिए यह संदेश भिजवाया है। उनके दिल पर चोट लगी और उन्होंने फिर तलवार से अपनी गर्दन काट ली। प्रहरियों में खलबली मच गई और उन्होंने राजा बलि तक विक्रम के बलिदान की खबर पहुँचाई। राजा बलि समझ गए कि वह व्यक्ति दृढ़ निश्चयी है और बिना भेंट किए जानेवाला नहीं है। उन्होंने फिर नौकरों द्वारा अमृत भिजवाया और उनके लिए संदेश भिजवाया कि भेंट करने को वे राज़ी हैं।
नौकरों ने अमृत छिड़ककर उन्हें जीवित किया तथा महल में चलकर बलि से भेट करने को कहा। जब वे राजा बलि से मिले तो राजा बलि ने उनसे इतना कष्ट उठाकर आने का कारण पूछा। विक्रम ने कहा कि धार्मिक ग्रन्थों में उनके बारे में बहुत कुछ वर्णित है तथा उनकी दानवीरता और त्याग की चर्चा सर्वत्र होती है, इसलिए वे उनसे मिलने को उत्सुक थे। राजा बलि उनसे बहुत प्रसन्न हुए तथा विक्रम को एक लाल मूंगा उपहार में दिया और बोले कि वह मूंगा माँगने पर हर वस्तु दे सकता है। मूंगे के बल पर असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं।
विक्रम राजा बलि से विदा लेकर प्रसन्न चित्त होकर मृत्युलोक की ओर लौट चले। पाताल लोक के प्रवेश द्वार के बाहर फिर वही अनन्त गहराई वाला समुद्र बह रहा था। उन्होंने भगवान विष्णु का दिया हुआ शंख फूँका तो समुद्र फिर से दो भागों में बँट गया और उसके बीचों-बीच वही भूमिवाला मार्ग प्रकट हो गया। उस भूमि मार्ग पर चलकर वे समुद्र तट तक पहुँच गये। वह मार्ग गायब हो गया तथा समुद्र फिर पूर्ववत होकर बहने लगा। वे अपने राज्य की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्हें एक स्त्री विलाप करती मिली। उसके बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर गहरे विषाद के भाव थे। पास आने पर पता चला कि उसके पति की मृत्यु हो गई है और अब वह बिल्कुल बेसहारा है। विक्रम का दिल उसके दुख को देखकर पसीज गया तथा उन्होंने उसे सांत्वना दी। बलि वाले मूंगे से उसके लिए जीवन दान माँगा। उनका बोलना था कि उस विधवा का मृत पति ऐसे उठकर बैठ गया मानो गहरी नींद से जागा हो। स्त्री के आनन्द की सीमा नहीं रही।

 

Author

hariomoberthur@gmail.com

Follow Me
Other Articles
Previous

छब्बीसवीं पुतली – मृगनयनी ~ रानी का विश्वासघात

Next

अट्ठाईसवीं पुतली ~ वैदेही ~ स्वर्ग की यात्रा

No Comment! Be the first one.

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

  • Hello world!
  • मंदिरों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य: सनातन धर्म में क्यों हैं इतने मंदिर?
  • शिव और सनातन धर्म का रहस्य: क्यों महादेव को आदि योगी कहा जाता है?
  • सनातन धर्म में गुरु का महत्व: क्यों गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है?
  • वसुधैव कुटुम्बकम्: सनातन धर्म पूरी मानवता को एक परिवार क्यों मानता है?

Recent Comments

  1. A WordPress Commenter on Hello world!
  2. hariom143 on हनुमान दर्शन हेतु मंत्र – HANUMAN DARSHAN HETU MANTRA
  3. hariom143 on भैरव साधना
  4. Sandeep kukreti on भैरव साधना
  5. Jitender on हनुमान दर्शन हेतु मंत्र – HANUMAN DARSHAN HETU MANTRA

Archives

  • July 2026
  • May 2026
  • March 2025
  • September 2023
  • March 2023
  • November 2022
  • September 2022
  • July 2022
  • April 2022
  • March 2022
  • January 2022
  • December 2019
  • November 2019
  • October 2019
  • September 2019
  • May 2018
  • December 2017
  • May 2017
  • February 2017
  • January 2017
  • November 2016
  • July 2016
  • June 2016
  • November 2015

Categories

  • Gita
  • Uncategorized
  • अघोर मंत्र
  • कुंडली चक्र
  • गीता
  • घरेलु टोटके
  • तांत्रिक मंत्र
  • देवी देवताओ की कथाएँ
  • धार्मिक ग्रन्थ
  • भक्त
  • यन्त्र संग्रह
  • वैदिक मंत्र
  • व्रत और त्यौहार
  • शाबर मंत्र
  • शिक्षाप्रद कथाएँ
  • सनातन धर्म के नियम
  • साधना में नियम
  • हमारे भारत के साधु संत
Copyright 2026 — Shiv Gorakh. All rights reserved. Blogsy WordPress Theme