Skip to content
-
Subscribe to our newsletter & never miss our best posts. Subscribe Now!
  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
Subscribe
Close

Search

Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

Shiv Gorakh Shiv Gorakh

सनातन ज्ञान • आध्यात्मिक चिंतन • आत्मबोध

  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
  • Home
  • 10 अलौकिक दैवीय वस्तुए
  • अघोर साधना
  • गायत्री देवी साधना
  • चालीसा संग्रह
  • दस महाविद्या साधना
  • बेताल पच्चीसी
  • मंत्र सागर
  • महाभारत की अद्भुत कहानियाँ
  • वैदिक मंत्र
  • शाबर मंत्र
  • श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ( कृष्ण – अर्जुन संबाद )
  • श्रीमद्भागवत महापुराण
  • सम्पूर्ण चाणक्य नीति
  • सम्पूर्ण सिंहासन बत्तीसी
  • साधना सिद्धि
  • स्रोत संग्रह
  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Uncategorized

श्रीमद्भागवत महात्म्यय विस्तृत

By hariomoberthur@gmail.com
November 5, 2019 13 Min Read
0

                              // ॐ नमो भगवते वासुदेवाय //

images (8)

                                          भागवत का उद्देश्य एवं माहात्म्य

श्रीमदभागवत महापुराण भारतीय सनातन संस्कृति का अत्यंत श्रेष्ठ ग्रन्थ है | यह भगवान वेदव्यासजी की रचना है | इसके महात्म्य का प्रतिपादन स्वयं वेदव्यासजी ने पद्मपुराण के उत्तरखण्ड मे किया है, जो श्रीसूत जी ओर श्रीशौनक जी के संवाद के रूप मे गुम्फ़ित है | श्रीमद्भागवतकथा के प्रारंभ करने के पूर्व इस महात्म्य के पाठ एवं श्रवण की विधि है | वेदव्यास जी ने महात्म्य के अंतर्गत भागवत-कथा की महत्ता बताते हुए मानव जीवन में इससे प्राप्त होने वाले लाभ की चर्चा की है | महात्म्य में छ: अध्याय है |

एस कलिकाल में व्यक्ति इतना आत्मकेंद्रित, स्वार्थी, लोभी एवं लालची हो गया है कि वह बिना किसी लाभ के कोई कार्य करना ही नहीं चाहता है | जब तक किसी काम में उसे कोई लाभ दिखाई नहीं देता, तब तक व्यक्ति उस और उन्मुख नहीं होता है | ऐसा व्यक्ति धर्म ग्रंथो के स्वाध्याय, पठन एवं श्रवण, अध्यात्मिक चिंतन जैसे कार्यो को तो और भी निरुपयोगी, अर्थहीन एवं व्यर्थ मानता है | ऐसी स्थिति में जब तक किसी ग्रन्थ की उपयोगिता एवं महत्ता व्यक्त न हो, तब तक व्यक्ति श्रवण हेतु समय निकालने को उपयोगी नहीं मानता है |

मनुष्य की इस मानसिकता के मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए ग्रंथकार ने भागवत के महात्म्य का वर्णन किया है | श्री मद्भागवत में बारह स्कंध है और १८००० ( अठारह हज़ार ) श्लोक है | श्रीमद्भागवत–महात्म्य का प्रथम श्लोक है-

 

                               सच्चिदानन्दरुपाय  विश्वोत्पत्यादिहेतवे |

                                तपत्रयविनाशाय  श्रीकृष्णाय वयं नमः ||

अर्थात सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते है, जो जगत कि उत्त्पति, स्थिति ओर विनाशके हेतु तथा अध्यात्मिक, आधिदैविक ओर अधिभौतिक – तीनो प्रकार के तापो का नाश करने वाले है |

ये जो संसार है, इस को बनाने वाला ईश्वर है | इसकी स्थिति भी उसीसे है ओर इसके विनाश (विलय) – का हेतु भी परमात्मा ही है | अर्थात संसार क आधार परमात्मा है, उसीके करण जगत की सत्ता है | वह भगवान सत्त्, चित्त्, आनन्द स्वरूप् है | संसार के जो दु:ख–ताप है, कलेश-कष्ट है, उनका शमन करने वाला परमात्मा ही है |

भगवान का स्वरूप सत्त्-चित्त्-आनन्दमय है, वे ही संसार के निर्माता, पालक एवं संहारक है ओर वे ही सभी प्रकार के कष्टो के विनाशक है अर्थात जीव ओर जगत के प्रणेता एवं नियन्त भगवान ही है | इस सत्य को जानकर मनुष्य मे उस परमात्मा को जाननेकी जिज्ञासा जागनी चाहिये, उसके स्वरूप् को जानने समझने का विचार उसके मन मे आना चाहिये, क्योकि वही तो जीव स्वयं भी है (“ तत्त्वमसि, सोऽहं ”) | परमात्मा को जानकर ही मनुष्य स्वयं के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सकता है और स्वयं के बारे में ज्ञान (आत्मज्ञान) प्राप्त करना ही मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य है | अतएव भागवत जीव, जगत और जगदीश्वर के सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाला महान कल्याणकारी ग्रन्थ है |

भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत का महात्म्य बताते हुए ब्रह्माजी से कहा है-

 

                            यः पठेत प्रयतो नित्यं श्लोक भागवतं सुत |

                            अष्टादशपुराणानां  फलमाप्नोति   मानव: ||

                                                                                         (स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, मार्गशीर्षमहात्म्य १६|३३)

पुत्र ! जो प्रतिदिन पवित्रचित्त होकर भागवत के एक श्लोक का पाठ करता है, वह मनुष्य अठारह पुराणोंके पाठ का फल प्राप्त करता है कलियुग में जहाँ-जहाँ पवित्र भाग्वातशास्त्र रहता है वहां-वहां मैं इस प्रकार रहता हूँ, जैसे पुत्रवत्सला गाय अपने बछड़े के पीछे-पीछे जाती है-

                              यत्र यत्र भवेत् पुण्यं शास्त्रं भागवतं कलौ |

                              तत्र तत्र  सदैवाहं  भवामि   त्रिदशैः  सह ||

                              यत्र यत्र    चतुर्वक्त्र  श्रीमद्भागवतं भवेत् |

                              गच्छामि तत्र  तत्राहं  गौर्यथा सुतवत्सला ||

 

सूतजी ने शौनकजीको भागवत की महिमा बताते हुए कहा है –

 

                               एतस्माद्परं  किञ्चिन्मनःशुध्यै न विद्यते |

                               जन्मान्तरे भवेत्पुण्यं तदा भागवतं लभेत ||

भागवत कथा से संबद्ध तीन संवाद है- (१) सूतजी-शौनकजीका, (२) सनकादि-नारदका, (३) शुकदेव-परीक्षितका | इनमे प्रमुख संवाद शुकदेव-परीक्षितका है पद्मपुराणोक्त भागवत-महात्म्य मे शौनकजी सूतजी से पूछते है कि भक्ति, ज्ञान, वैराग्यकी प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइये | कोई ऐसा साधन बताइये, जिससे इस कलिकाल के पापों से मुक्त होकर व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त कर सके | तब सूतजी ने कहा कि मनुष्य को समस्त पापों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करने वाला शास्त्र भागवत-पुराण है | सूतजी ने शौनकजी से इसकी महिमा का बखान किया और कहा कि अब मैं आपको वह कथा सुनाता हूँ, जो सनकादिक ऋषियों ने नारदजी को सुनाई थी |

 

**श्रीमद्भागवत-महात्म्य के प्रसंगमे भक्ति के कष्ट-निवारणकी कथा**

एक बार चारो ऋषि (सनकादिक) विशालपुरी में पधारे हुए थे, वहां उन्होंने नारदजी को देखा | नारदजी का मुख म्लान और उदास था | मुनियोंने उनसे इसका कारण पूछा | नारदजी बोले – मैं सर्वोत्तम लोक समझकर पृथ्वी लोक पर गया, पर वहां पर मुझे बड़ी अद्भुत स्थिति देखने को मिली | मैं सारे तीर्थो में घुमा पर कहीं भी मुझे शांति नहीं मिली | वहां चारो और अधर्म का बोलबाला है, जीव केवल अपना ही पेट पलने में लगे हुए है |  वे असत्य भाषी और आलसी हो गए है | स्त्री-पुरुषों में केवल कलह मचा रहता है | पृथ्वी पर विचरता हुआ मैं यमुना-तट पर पंहुचा तो वहां मैंने देखा कि एक युवती स्त्री दु:खी मन से बैठी है, उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेतावस्था में पड़े है, जिन्हें बार-बार होशमें लाने का प्रयत्न कर रही है, पर उन्हें होश नहीं आरहा है | मुझे देख कर वह तरुण स्त्री खड़ी हो गयी और प्रार्थना करने लगी मेरे इन पुत्रो को होश में ला दिजिये, मैं बहुत दुखी हूँ नारदजी के पूछने पर उसने बताया कि मैं भक्ति हूँ, ये दोनों मेरे बेटे ज्ञान और वैराग्य हैं | मैं (भक्ति) द्रविड़ देशमे जन्मी, कर्णाटक में बड़ी, कहीं-कहीं महाराष्टमें सम्मानित हुई, पर गुजरात में मुझे बुढ़ापेने आ घेरा | अब जब से वृन्दावन आयी हूँ, तबसे सुंदरी रूपवती युवती हो गयी हूँ, किन्तु मेरे पुत्र उसी अवस्था में हैं | आप कुछ उपाय कीजिये, जिससे ये स्वस्थ, चेतन और तरुण हो जाएँ | नारदजी ने उन दोनों को वेदध्वनी, वेदांतघोष और बार-बार गीता पाठ करके जगाया, इससे उनमे थोड़ी सी चेतनता आयी; किन्तु वे फिर निस्तेज होकर गिर पड़े | इस पर नारदजी बड़े चिंतित हुए कि अब क्या किया जाय | इसी समय आकाशवाणी हुई कि तुम सत्कर्म करो, पर इसका आशय नारदजी को समझमें नहीं आया | नारदजी वहां से चल दिए और मार्ग में मिलने वाले मुनीश्वरो से वह साधन पूछने लगे, पर किसी से कुछ बताते नहीं बना | तब नारदजी बदरीवन आये और तप करने का विचार करने लगे, इतनेमेंही सामने उन्हें सनकादिक ऋषि दिखाई दिए | नारदजी ने कहा-मुनिवरो ! बड़े भाग्य से आपका समागम हुआ है | नारदजी ने उन्हें अपनी समस्या बतायी | सनकादिक ने कहा आप चिंता न करें | भागवत-महापुराण सुनने से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बल मिलेगा | इसके साथ नारदजी के साथ सनकादिक भी श्रीमद्भागवत-कथामृत का पान करने गंगा तट पर आये | भागवत कथा का समाचार पाकर सभी ऋषि-मुनि दौड़-दौड़कर वहां आ पहुंचे | इसके अतिरिक्त वेद, वेदांत(उपनिषद), सभी पुराण एवं छहों शास्त्र भी मूर्तिमान होकर वहां उपस्थित हुए |

सनकादिक नारदजी के दिए हुए आसन पर विराजमान हुए और भागवत-कथा का महात्म्य सुनाने लगे | वे बोले- नारदजी ! भागवत-कथा के श्रावण मात्र से मुक्ति हाथ लगती है | भागवत में अठारह हज़ार श्लोक है और यह शुकदेव-परीक्षित का संवाद है जिस घर में नित्यप्रति भागवत कथा होती है, वह घर तीर्थरूप होजाता है जो लोग उसमे रहते है, उनके सारे पाप नष्ट होजाते है | जो मनुष्य अंत समय में भी भागवत सुन लेता है, उसे प्रभु वैकुण्ठ धाम दे देते है | जब करोड़ो जन्मो के पुण्य उदय होते है तभी भागवत की प्राप्ति होती है-

‘कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते ||’

भागवत की महत्ता सुनकर शौनकजी ने पूछा-सूतजी ! भागवत मोक्ष की प्राप्ति में सभी साधनों से कैसे आगे बढ़ गया ? तब सूतजी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण जब अपने स्वधाम को पधारने लगे तो उद्धव ने उनसे कहा कि आप तो जारहे हैं, अब इस घोर कलियुग में साधु, संत, सज्जनों की रक्षा कौन करेगा और उनके जीवन का सहारा क्या होगा ? इसलिए आप उनके हितमें यहाँ से न जाइये | इसपर भगवान सोचने लगे कि भक्तो के अवलम्बन के लिए मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिए | तब भगवान ने अपनी साडी शक्ति श्रीमद्भागवत में रख दी और वे अंतर्ध्यान होकर इस भागवत समुद्रमें प्रवेश कर गये-

स्वकीयम् यद्भवेत्तेजस्तच्च भग्वतेअधात |

    तिरोधाय   प्रविष्टोयं श्रीमद्भागवतार्पणम् ||

इसलिये ये भागवत भगवान की साक्षात शब्दमयी मूर्ति है, यह भगवान क वङ्मयस्वरूप् है | इसके पठन, श्रवण, दर्शन से मनुष्य का मन निर्मल होजाता है ओर उसमे भक्ति का उदय होता है, जो सब प्रकार से मनुष्य का कल्याण करती है | फिर सूतजी बोले-शौनकजी ! जिस समय सनकादिक मुनीश्वर ग्रन्थ-महिमा बता रहे थे, तब उस सभा में एक बड़ा आश्चर्य घटित हुआ | वहां तरुणावस्था को प्राप्त हुए दोनों पुत्रो के साथ विशुद्ध प्रेमस्वरूपा भक्ति भगवन्नामो का उच्चारण करती हुई प्रकट हो गयी सनकादिक ने कहा कि ये भक्ति देवी कथा के प्रभाव से ही यहाँ प्रकट हुई हैं | भक्ति देवी सनकादिक से बोली- अपने कथा सुनाकर मुझे फिर पुष्ट कर दिया है, अब मैं कहाँ रहूँ ? तब मुनिश्वरोंने कहा- ‘देवी!तुम भक्तो के ह्रदय में निवास करो |’ यह सुनकर भक्ति तुरंत भक्तो के ह्रदय में जा विराजीं | भक्ति के वश होकर भगवान भी भक्तो के पास खिंचे चले आते हैं | भक्ति प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन भागवत-कथामृत का पान करना है | कलियुग में यह सर्वोत्तम साधन है |

फिर सूतजी ने कहा कि कथा के समय भक्ति का प्रादुर्भाव हुआ देख भगवान श्रीकृष्ण भी अपने आलौकिक अलंकरण धारण किये हुए परमसुन्दर रूपमे अपने धाम को छोड़ वहां पधारे | भक्तों ने उनके दर्शन कर उनकी रूपमाधुरी का अपलक नेत्रोंसे पान किया | देखते-ही-देखते वे मुरलीमनोहर सब भक्तोंके ह्रदय में विराज गये | सभीको देह-गेहकी सुधि भूल गयी और एक अनिवर्चनीय आनन्द के सिन्धुमें वे सब डूब गये | ऐसा अद्भुत आनन्द रस बरसता है भागवतके सप्ताह-परायण महायज्ञमें | सनकादिक ऋषि ने कहा कि इस कथा के श्रवणसे मनुष्य बड़े-से-बड़े पापोंसे मुक्त हो पूर्णतः पवित्र हो जाते हैं | इस प्रसंग से दो महत्त्वपूर्ण तथ्य उजागर होते हैं- एक तो यह कि तरुणावस्था में ही जो तरुण उत्साहहीन, उमंगहीन हो वृध्दों-जैसे दिखने लगते है और जीवनमें हताशा-निराशाके जालमें फँस जाते हैं, उन्हें केवल शास्त्रोंके ओजस्वी वचन सुनाकर ही जगाया जा सकता है | शास्त्र ही उनमें तरुणाईका पुनः संचार कर सकते हैं | इसलिए तरुणों एवं युवकोंको अध्यात्मिक ग्रन्थोंका स्वाध्याय करना चाहिए | दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भगवानका सान्निध्य, उनका अनुग्रह भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है | भक्तिसे भगवान भक्तके ह्रदयमे आ विराजते हैं |

 

गोकर्णका आख्यान

भागवत के महत्म्यको प्रतिपादित करनेहेतु सूतजी एक अन्य प्रसंग सुनाते हुए कहते हैं कि पूर्वकालमें तुंगभद्रा नदी के तटपर एक सुन्दर नगर बसा हुआ था, उस नगर में आत्मदेव नामके एक ब्राह्मण थे, उनकी पत्नी धुन्धुली कुलीन एवं सुंदरी होने पर भी जिद्दी स्वभावकी थी | वह स्वाभाव से क्रूर, बकवाद करनेवाली और झगड़ालू थी | ब्राह्मण दम्पत्ति सब प्रकार से संम्पन्न थे, पर उनके कोई संतान नहीं थी | जब उम्र अधिक हो गयी तो उन्होंने संतान-प्राप्तिहेतु कई प्रकार के दान-यज्ञ किये, पर संतान नहीं हुई |

एक दिन दु:खी होकर वह ब्राह्मण वनको चल दिया |  चलते-चलते उसे प्यास लगी तो एक तालाब के किनारे गया और जल पीकर वहीँ बैठ गया | दो घड़ी बीतने पर वहां एक सन्यासी आये | जब उन्होंने जल पी लिया तो ब्राह्मण उनके पास गया और अपनी व्यथा सुनायी | सन्यासी ने कहा कि ब्राह्मणदेव ! माया-मोह छोड़ दो, कर्मकी गति गहन है- ‘गहना कर्मणो गतिः’ (गीता ४/१७)| सात जन्मतक तुम्हारे कोई संतान किसी प्रकार नहीं हो सकती | जब ब्राह्मण नहीं माना और प्राण त्यागनेको तैयार हुआ तो सन्यासीने एक फल देकर कहा कि यह फल अपनी पत्नीको खिला देना, इससे उसको पुत्र उत्पन्न होगा |

ब्राह्मण फल लेकर घर आया और सारा वृत्तान्त बताकर पत्नी (धुन्धुली)-को फल दे दिया | पत्नी कुतर्की स्वाभाव की तो थी ही,उसने सोचा गर्भधारणकी परेशानियों एवं प्रसवके पचड़ेमें कौन पड़े, इसलिए उसने वह फल नहीं खाया और अपनी गाय को खिला दिया | पति से झूट बोल दिया की उसने फल खा लिया है और गर्भवती होने नाटक करने लगी | दैवयोग से उसीकाल में उसकी बहन के भी बच्चा होने वाला था उसने बहन से मंत्रणा करके वह पुत्र अपने घर बुलवा लिया और स्वयं का पुत्र बता दिया और बहन को यह कहकर रख लिया कि मेरे स्तन में दूध नहीं है और इसका बच्चा मर गया है, यह मेरे बच्चे को पाल देगी | धुन्धुलीने ने पुत्र का नाम धुन्धुकारी रखा | आत्मदेव बड़ा प्रसन्न हुआ | तीन महीने के अन्तराल से उस गायने भी एक सुन्दर कन्तिवाले बालक को जन्म दिया | उसे देखकर ब्राहमण बड़ा प्रसन्न हुआ | बालक के कान गौ के कान-जैसे थे, अतः आत्मदेव ने उसका नाम गौकर्ण रखा |

काल बीतने पर दोनों बालक जवान हो गए | उनमें गौकर्ण तो पंडित और ज्ञानी हुआ और धुन्धुकारी बड़ा ही राक्षस प्रवृत्ति का हुआ, धुन्धुकारी बड़ा दुष्ट,और क्रूर था | वह चोरी और हत्याएँ करता और दीन-दुखियोंको तंग करता था | वेश्याओं के जाल में फंसकर उसने माँ-बाप की सारी संम्पत्ति नष्ट कर दी | एक दिन माता-पिता को मारपीटकर, वह घर के बर्तन-भांड़े भी उठा ले गया |

इस प्रकार संपत्ति स्वाह होते देख और कुपुत्र के कष्टों से आत्मदेव फूट-फूट कर रोने लगा और कहने लगा कि इससे तो संतानहीन ही अच्छा था | हाय ! अब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊं ? इस तरह ब्राहमण विलाप कर ही रहा था कि उसी समय परम ज्ञानी गौकर्ण वहाँ आ पहुँचे | उन्होंने पिता को वैराग्यका उपदेश देते हुए बहुत प्रकार से समझाया | पिताजी ! यह संसार असार है, स्त्री-पुत्र के मोह-माया में न फँसिये |यह शरीर भी अपना नहीं है, यह तो कालका ग्रास है | मोह-ममता को छोड़कर वन को जाइये और भगवान में मन लगाइये | आत्मदेव गौकर्ण का कहना मानकर वन को चलेगये  और वहाँ भगवत-भजनकर भगवान के धाम को पधारे |

यहाँ धुन्धुकारी रुपये-पैसों के लिये माँ को मरने पीटने लगा | तंग आकर माँ ने एक दिन कुँए में गिर कर जान दे दी |धुन्धुकारी पाँच वेश्याओं को ले आया और अपने घर में रखा | उनकी इच्छाओं की पूर्ति के लिये वह चोरीकर धन लाने लगा | वेश्याओं ने सोचा कि इसकी चोरीकी वजह से किसी दिन हम पकड़ी न जाये, इसलिए उन पांचो ने मिलकर धुन्धुकारी की हत्या कर दी | यहाँ कथा का सुन्दर संकेत यह है कि ये पाँच वेश्याएँ हमारी इन्द्रियाँ हैं और उन्ही की इच्छापूर्ति, तृप्ति एवं तुष्टि के लिए मनुष्य नाना प्रकार के पाप, दुष्कर्म करता है और ये ही एक दिन उसके अंत का कारण बनती है, इन्हीं के जाल में फंसकर वह अपना अंत स्वयं करता है | धुन्धुकारी अपने इन्हीं कर्मो के कारण भयंकर प्रेत बना  वह बवंडर की तरह चारो तरफ भटकता फिरता था तथा भूख-प्यास से व्याकुल हो चिल्लाता रहता था | गौकर्ण तीर्थयात्रा पर गये हुए थे | वहाँ उन्होंने लोगोंके मुँह से धुन्धुकारी की मृत्यु का समाचार सुना तो गयामे जाकर उन्होंने भाई का विधिवत श्राद्ध किया | कुछ समय बाद गौकर्ण अपने नगर लौटे रात्रि का समय था, अतः वे सीधे अपने घर गये | रात्रि में गौकर्ण को सोया देख प्रेतरूपी धुन्धुकारी अपनी व्यथा सुनायी और कहा कि मैं तुम्हारा भाई अपने पापकर्मो के कारण प्रेतयोनि में पड़ा हूँ,मुझे इससे मुक्ति दिला दीजिये |

धुन्धुकारी की मुक्ति के लिये गौकर्ण ने भागवत-सप्ताहरूपी ज्ञानयज्ञका आयोजन किया और स्वयं भागवत-कथा का प्रारम्भ किया | बड़ी संख्या में श्रोता आये | प्रेतयोनि वाला धुन्धुकारी भी पवन रूप में आया | अपने लिए कोई स्थान न देखकर वहाँ स्थित सात गांठों वाले बांसकी पोरमें घुस गया और कथा सुनने लगा | कथा समाप्ति पर प्रतिदिन एक घटना घटती | रोज़ बांस की एक पोर चटक जाती थी | अंतिम दिवस आखिरी गांठ भी चटक गयी और धुन्धुकारी प्रेतयोनि से छुटकारा पा दिव्य रूप में प्रकट हुआ | बांस की ये सात गांठें मनुष्यकी वासनाओं-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अहं (अहंकार)-की प्रतीक हैं | इनके हटते ही व्यक्ति अपने दिव्य स्वरुप में आ जाता है उसी समय वैकुंठसे पार्षदों सहित एक विमान उतरा और धुन्धुकारी को उसमे बिठाकर ले गये सभी ने दृश्य बड़े विस्मय से देखा | यह भागवत-कथा को श्रद्धा मननपूर्वक सुनने का परिणाम था | जैसे आगमें तपकर सोना कंचन बनता है, वैसे ही पश्चातापकी आगमें तपकर पापी भी पुण्यात्मा बन जाता है और फिर भक्ति एवं सत्संग के माध्यम से मुक्ति प्राप्त करता है |

इसके बाद श्रावण मास में गौकर्ण ने पुनः कथा कही | उसकी समाप्ति वहाँ बहुतसे विमान आये और गौकर्ण सहित सभी श्रोतओंको वैकुंठ ले गये |

आत्मदेव-धुन्धुली-धुन्धुकारी-गौकर्ण के इस सम्पूर्ण आख्यान से व्यासजी हमें यह संकेत दे रहे हैं कि संसार में आकर मनुष्य को भगवद-भजन करते हुए सत्कर्म करने चाहिए | ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य पूर्ण करना चाहिए और भगवान जिस हाल में रखें, उसी में प्रसन्न रहना चाहिए |

अतएव भागवत-कथा व्यक्ति को अपने सांसारिक कर्तव्यों एवं दायित्वोंका निर्वाह करते हुए आत्मोत्थानपर चिंतन करने हेतु प्रेरित करती है और यह चिंतन-मनन उसे मोक्षपथ पर ले जाकर परमात्मा से साक्षात्कार कराता है |

                                                      श्रीमद्भागवत महापुराण कथा
कथा महात्म्य प्रथम स्कंध द्वितीय स्कंध तृतीय स्कंध
चतुर्थ स्कंध पंचम स्कंध षष्ठम स्कन्ध सप्तम स्कंध
अष्टम स्कंध नवम स्कंध दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध) दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)
एकादश स्कन्ध द्वादश स्कन्ध श्रीमद्भागवतमाहात्म्य
Author

hariomoberthur@gmail.com

Follow Me
Other Articles
Previous

भागवतकथोपरान्त श्रीमद्भागवतमाहात्म्य

Next

श्रीमदभागवत कथा प्रथम स्कन्ध

No Comment! Be the first one.

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

  • Hello world!
  • मंदिरों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य: सनातन धर्म में क्यों हैं इतने मंदिर?
  • शिव और सनातन धर्म का रहस्य: क्यों महादेव को आदि योगी कहा जाता है?
  • सनातन धर्म में गुरु का महत्व: क्यों गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है?
  • वसुधैव कुटुम्बकम्: सनातन धर्म पूरी मानवता को एक परिवार क्यों मानता है?

Recent Comments

  1. A WordPress Commenter on Hello world!
  2. hariom143 on हनुमान दर्शन हेतु मंत्र – HANUMAN DARSHAN HETU MANTRA
  3. hariom143 on भैरव साधना
  4. Sandeep kukreti on भैरव साधना
  5. Jitender on हनुमान दर्शन हेतु मंत्र – HANUMAN DARSHAN HETU MANTRA

Archives

  • July 2026
  • May 2026
  • March 2025
  • September 2023
  • March 2023
  • November 2022
  • September 2022
  • July 2022
  • April 2022
  • March 2022
  • January 2022
  • December 2019
  • November 2019
  • October 2019
  • September 2019
  • May 2018
  • December 2017
  • May 2017
  • February 2017
  • January 2017
  • November 2016
  • July 2016
  • June 2016
  • November 2015

Categories

  • Gita
  • Uncategorized
  • अघोर मंत्र
  • कुंडली चक्र
  • गीता
  • घरेलु टोटके
  • तांत्रिक मंत्र
  • देवी देवताओ की कथाएँ
  • धार्मिक ग्रन्थ
  • भक्त
  • यन्त्र संग्रह
  • वैदिक मंत्र
  • व्रत और त्यौहार
  • शाबर मंत्र
  • शिक्षाप्रद कथाएँ
  • सनातन धर्म के नियम
  • साधना में नियम
  • हमारे भारत के साधु संत
Copyright 2026 — Shiv Gorakh. All rights reserved. Blogsy WordPress Theme