प्रथम स्कन्ध
भागवत के प्रथम स्कंध में उन्नीस अध्याय हैं | प्रथम स्कंध मंगलाचरण के साथ प्रारम्भ होता है इसमें वेदव्यास जी कहते है – ‘सत्यं परं धीमहि’ अर्थात परम सत्य रूप परमात्मा का हम ध्यान करते है | यहाँ वेदव्यास जी ने भगवान की किसी विग्रह का वर्णन नहीं किया है राम, कृष्ण, शिव आदि किसीभी भगवान का नाम नहीं लिया है | केवल सत्य स्वरुप परमात्मा का मैं ध्यान करता हूँ, ऐसा लिखा है भक्त, साधक किसी भी आराध्य का ध्यान कर ले, जिसमें उसकी श्रद्धा हो, आस्था हो वे सब सत्य-स्वरुप परमात्मा के ही विविध रूप है |
नैमिषारण्य-क्षेत्र में सूतजीको आसन पर विराजमान कराकर शौनकादिक ऋषियों ने उनसे बड़े जिज्ञासापूर्वक पूछा कि सूतजी! कलियुग में मनुष्यों का कल्याण करने वाली कथा हमें सुनाइये ! ऐसी कथा जो मनुष्यों को जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा दिला कर मोक्ष प्रदान कर सके |
ऋषियों की जिज्ञासा सुनकर सूतजीने सर्वप्रथम भगवान के चौबीसों अवतारों की कथा उनको सुनायी | अवतारों की कथा सुनने से मनुष्यमे भक्त में भगवान की भक्ति का प्रादुर्भाव होता है |
भगवान के चौबीस अवतार है-
- सनत्कुमार
- वराह
- नारदजी
- नर-नारायण
- कपिलदेव
- दत्तात्रेय
- यज्ञ
- ऋषभदेव
- पृथु राजा
- मत्स्यनारायण
- कच्छप
- धन्वन्तरी
- मोहिनी
- नरसिंह
- वामन
- परशुराम
- वेदव्यास
- श्रीराम
- बलराम
- श्रीकृष्ण
- बुद्ध
- कल्कि
- हंस
- हयग्रीव
सूतजी बोले – शौनकादि ऋषियो ! एक बार वेदव्यास जी सरस्वती नदी के तट पर एकांत में बैठे थे, उनका मन कुछ खिन्न सा था वे सोच रहे थे कि मैं इतने सरे ग्रंथो की रचना कर चुका हूँ फिर भी मेरा मन अपूर्ण काम सा लग रहा है, मुझे शांति और संतुष्टि नहीं मिली है | बड़े ही चिंतित और उद्विग्न हो रहे थे व्यासजी | ठीक उसी समय आश्रम में देवर्षि नारदजी आ पहुँचे | व्यासजी ने नारदजी की विधिवत पूजा की | सूतजी कहते है नारदजीने मुस्कुराकर व्यासजीसे कहा आप अपने चिंतन और कर्मो से संतुष्ट तो हैं न ? आपने तो महाभारत जैसे अद्भुत ग्रन्थ की रचना की है | और सनातन ब्रह्मतत्त्व को जान लिया है फिर आप क्यों शोक कर रहे हैं ? तब व्यासजी ने नारदजी से ही अपने शोक का कारण जानना चाहा |
नारद जी बोले – व्यासजी ! आपने भगवान के निर्मल यश का गान नहीं किया है, इसलिए आपको शांति एवं संतुष्टि नहीं मिल रही है | जो ज्ञान भगवान की भक्ति से रहित होता है वह न तो कल्याणकारी होता है और न ही शांतिप्रदायक | जीवन में परिपूर्णता, संतुष्टि और आनन्द तो भक्ति से प्राप्त होता है | इसलिए आप विशेष रूप से भगवान की लीलाओं का कीर्तन कीजिये | फिर नारदजी ने अपने पूर्व जन्म की कथा व्यासजी को सुनायी | उन्होंने कहा की मैं दासीपुत्र था, किन्तु भगवद्भक्त ऋषि-मुनियों के संग रहने से मुझमें भगवद्भक्ति जागी और अगले जन्म में मैं ब्रह्माजी का मानस पुत्र हुआ |मेरे जीवन-अनुभव का सर यह है कि भगवान की लीलाओं का कीर्तन संसार-सागर से पार जाने का जहाज है |
नारदजी के चले जाने पर आश्रम में ध्यानमग्न होकर व्यासजी ने नारदजीकी बातों पर चिंतन-मनन किया और फिर उन्होंने परमहंसोंकी संहिता ‘श्रीमद्भागवत’ की रचना की, जिसके श्रवण मात्र से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति परम प्रेममयी भक्ति का उदय होता है और जिसके जीवन के शोक, मोह और भय नष्ट हो जाते हैं-
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपुरुषे |
भक्तिरुत्पद्यते पुन्सः शोकमोहभयापहा ||
व्यासजी ने इस भागवतसंहिताको अपने पुत्र शुकदेवको पढ़ाया |
द्रौपदीकी अद्भुत क्षमा
सूतजी बोले-शौनकजी! अब मैं राजर्षि परीक्षितके जन्म, कर्म और मोक्ष तथा पांडवोंके स्वर्गारोहणकी कथा कहता हूँ; क्योंकि इन्हींसे भगवान श्रीकृष्णकी अनेक कथाओं का उदय होता है |
महाभारत-युद्ध में कौरव-पाण्डव दोनों पक्षोंके बहुत से वीर वीरगति को प्राप्त हो चुके थे | तब अश्वत्थामाने द्रोपदी के सोते हुए पुत्रों के सिर काटकर दुर्योधन को भेंट किये | यह देखकर द्रोपदी अत्यंत दु:खी हो गयी और फूट-फूट कर विलाप लगी | अर्जुनने सांत्वना देते हुए कहा- कल्याणी! मैं उस आततायीका सिर काटकर तुम्हें भेंट करूँगा और यह कहकर वे भगवान श्रीकृष्ण के साथ रथ पर सवार होकर गाण्डीव ले अश्वत्थामा के पीछे दौड़े | जब उसने दूर से अर्जुन को देखा तो जहाँ तक भाग सकता था भागा, फिर उसने प्राण रक्षा के लिए ब्रम्हास्त्रका सन्धान किया | अर्जुन ने देखा की एक भयंकर तेज उस और आरहा है उसने भगवान के बताने पर ब्रह्मास्त्रसे ही ब्रह्मास्त्रका तेज़ शांत कर दिया | अर्जुन ने अश्वत्थामा को पकड़ कर रस्सी से बांध लिया और शिविर की ओर लेजाने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि इसने जघन्य अपराध किया है, अतः इसे मार ही डालो | परन्तु अर्जुन का ह्रदय महान था, उसके मन में गुरु-पुत्र को मारने की इच्छा नहीं हुई | अर्जुन ने रस्सी से बंधे अश्वत्थामाको लेजाकर द्रोपदी के सामने खड़ा कर दिया | उसे देखकर द्रोपदी को आचार्य द्रोण और विधवा गुरुपत्नीकी याद आ गयी और द्रोपदी ने इतना बड़ा अपराध कर भरी दुख पहुँचाने बाले अश्वत्थामा को क्षमा कर दिया | कितनी महान थी द्रोपदी ! क्या आज कोई भी नारी ऐसी स्थिति में इतनी दया दिखा पायेगी ? भगवान कृष्ण के संकेत को समझकर अर्जुनने तलवारसे अश्वत्त्थामाके सिर की मणि बालोंसहित उतर ली | बालकों की हत्या करने से वह श्रीहीन तो पहले ही होगया था, अब मणि और ब्रह्म तेज़ से भी रहित हो गया | इसके बाद अर्जुन ने रस्सी का बंधन खोलकर उसे बाहर निकाल दिया | सिर का मुंडन कर देना, धन छीन लेना और बहार निकाल देना- यही ब्राह्मणअधमों का वध है |
पांडवोंने मृतपरजनोंकी अंतेष्टि-क्रिया की | सभीने गंगा तट पर आकर मृत बंधुओको जलदान दिया | वहाँ युधिष्ठिर, ध्रतराष्ट्र, गांधारी, कुंती,द्रोपदी सब बैठकर मरे हुए स्वजनोंके लिए शोक करने लगे, तब भगवान ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा-
‘भूतेषु कालस्य गतिं दर्शयन्नप्रतिक्रियाम् ||’
(श्रीमद्भगवद १/८/४)
संसार के सभी प्राणी कालके आधीन हैं | मौतसे किसीको कोइ नहीं बचा सकता | मृत्यु से भय खाना निरर्थक है वह अपने नियत समय एवं स्थान पर मनुष्य को ले आती है | इसलिए मनुष्य को हर समय मृत्यु से भयभीत एवं आशंकित-सशंकित नहीं रहना चाहिए और निर्भीक होकर अपना कर्म करते रहना चाहिये |
भगवान श्रीकृष्णद्वारा गर्भस्थ परीक्षितकी रक्षा
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्णने युधिष्ठरका राज्य जो धूर्तोंने छलसे छीन लिया था, वापस दिलाया | युधिष्ठरने तीन अश्वमेघ यज्ञ किये | इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने वहाँ से जाने का विचार किया | उन्होंने पाण्डवों से विदा ली, व्यास आदि ब्राह्मणों का सत्कार किया | उन लोगों ने भगवान का बड़ा सम्मान किया | तदन्तर भगवान सात्यकि और उद्धव के साथ द्वारका जाने के लिए रथ पर सवार हुए | उसी समय उन्होंने देखा कि उत्तरा भय से विह्वल होकर सामनेसे दौड़ी चली आ रही है |
उत्तराने कहा-
पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते |
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम् ||
देवाधिदेव! जगदीश्वर! आप महायोगी हैं | आप मेरी रक्षा कीजिये | आप के अतिरिक्त इस लोक में मुझे अभय देने वाला और कोई नहीं है | क्योंकि यहाँ सभी परस्पर एक-दुसरे की मृत्यु के निमित्त बन रहे हैं | उत्तरा फिर बोली – यह दहकता हुआ लोहे का बाण मेरी ओर दौड़ा चला आरहा है | स्वामिन ! यह मुझे भले ही जला डाले, पर मेरे गर्भ को नष्ट न करे, ऐसी कृपा कीजिये | भक्तवत्सल भगवान उसकी बात सुनते ही जान गए की अश्वत्थामा ने पांडवो के वंशको निर्बीज करने के लिए ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया है | उसी समय पाण्डवोंने देखा कि जलते हुए पाँच बाण उनकी ओर आरहे हैं | इसलिए उन्होंने भी अपने अस्त्र उठा लिए | भगवान ने अपने भक्तों पर बहुत बड़ी विपत्ति आयी जानकर अपने सुदर्शन चक्र से उनकी रक्षा की | उत्तरा के गर्भ को भगवान ने अपनी माया के कवच से ढँक दिया | द्रौपदी ने उत्तरा को सीख दी थी कि जीवन में दुःख आये, संकट आये, आपत्ति-विपत्तियाँ आ घेरें तो परमात्माकी शरण में जाना, उन्हींसे दुःख-निवृत्तिकी प्रार्थना करना | वे ही तेरी मदद करेंगे | दुनिया वाले, परिवारवाले तो एक-दुसरे का मुहं ही ताकते रहेंगे, मदद कोई नहीं करेगा | कितनी सार्थक शिक्षा दे रहा है भागवत |
कुंतीद्वारा भगवानकी स्तुति और दुःखका वरदान माँगना
जब भगवान जाने लगे तब ब्रह्मास्त्रसे मुक्त हुए अपने पुत्रों एवं द्रौपदीके साथ कुंतीने भगवान की स्तुति की |
कुंतीने कहा- आप समस्त जीवोंके भीतर और बाहर एकरस होकर विराजमान हैं | मैं आपको नमस्कार करती हूँ | श्रीकृष्ण, वासुदेव, देवकीनंदन, नंदगोपके लाडले लाल आप गोविन्दको हमारा बार-बार प्रणाम है-
कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च |
नंदगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ||
(श्रीमद्भा० १/८/२१)
प्रभो! आपने अनेक विपत्तियोंसे हमारी रक्षा की है | विषसे, लाक्षागृहकी भयानक आग से, दुष्टोंकी द्यूत-सभासे, वनवासकी विपत्तियोंसे और न जाने कितनी जानी-अनजानी आपत्तियोंसे आपने हमें उबारा है | फिर कुंती’ने प्रभुसे जो माँगा है, वैसा आजतक किसी भी भक्तने नहीं माँगा होगा | कुंती कहती हैं-
विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरु |
भवतो दर्शनं यात्स्यदपुनर्भवदर्शनम् ||
(श्रीमद्भा० १/८/२५)
जगदगुरो! हमारे जीवनमें सर्वदा पद-पदपर विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि विपत्तिमें ही निश्चित रूपसे आपके दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता | कुंती ने भगवान से दुःख इसलिए माँगा कि दुःख में तो आप साथ थे और अब सुख आया है तो आप हमें छोड़कर जा रहे है इससे तो वे दुःख ही अच्छे थे जिनके कारण आप सदा हमारे साथ थे मनुष्य इतना स्वार्थी है कि सुखमें तो भगवान को भूल जाता है केवल दुःख में याद करता है | इसलिए किसी भक्तने सही कहा है –
सुख के माथे सिल पड़े जो दे नाम भुलाय |
बलिहारी वा दुःख की पल-पल नाम रटाय ||
श्रीकृष्णकी महिमा एवं भक्त-वत्सलताका गान करते हुए कुंतीने अनेक प्रकार से भगवान की स्तुति की | पाण्डव परिवार के प्रति दर्शाये गए प्रेम एवं दिए गये संरक्षण के प्रति कुंती ने कृतज्ञता प्रकट की और कहा की आपके बिना मेरा एवं मेरे पुत्रोंका अस्तित्व ही क्या रह जाता है | हम जो कुछ थे और जो कुछ आज हैं, वह आपकी महती कृपा के कारण ही हैं |
वास्तव में मनुष्य के अस्तित्व, व्यक्तित्व एवं क्रतित्वके पीछे भगवानकी ही कृपा रहती है | अहंकारी मनुष्य सोचता है कि जीवन की उपलब्धियाँ उसकी स्वयंकी हैं, पर ईशकृपा के बिना कर्म फलित नहीं होता है | अतः मनुष्य को भक्तिमें लीन रहते हुए कर्म करना चाहिये | भगवान ने गीता में अर्जुन के माध्यम से हमें यही सन्देश दिया है- ‘मामनुस्मर युद्ध च |’ (८/७) अर्थात मुझे स्मरण करते हुए ( मेरी भक्ति करते हुए ) युद्ध करो अर्थात कर्म करो |
कुंतीने मधुर शव्दोंमें भगवान की अधिकांश लीलाओंका वर्णन किया है स्तुति सुनकर भगवान मंद-मंद मुस्कराने लगे और वे रथ के स्थान से उतरकर हस्तिनापुर लौट आये | यदि हम भगवान को उनके स्थान से अपने घर बुलाना चाहते हैं तो हमें भगवान की श्रद्धाभाव से स्तुति करनी चाहिए, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए | हस्तिनापुरमें कृष्ण कुंती और सुभद्रा से विदा लेकर जब जाने लगे तो युधिष्ठरने बड़े प्रेमसे उन्हें रोक लिया |
भीष्म पितामहद्वारा भगवान श्रीकृष्णकी
स्तुति और प्राण-त्याग
परिजनोंकी मृत्युसे युधिष्ठर अत्यधिक दुखी एवं विह्वल हो रहे थे | भगवान श्रीकृष्ण और व्यास जी ने उन्हें सांत्वना दी | परन्तु युधिष्ठर को शांति नहीं मिल रही थी | श्रीकृष्ण युधिष्ठर आदि पांडवो को साथ लेकर भीष्म-पितामह के पास आये, जहाँ वे शरशय्यापर पड़े थे यहाँ भीष्म ने पांडवो को सान्तवना दी एवं विविध उपदेश दिये | भीष्मपितामह ने कहा-
युधिष्ठर! संसारकी सारी घटनाएँ ईश्वरकी इच्छा के आधीन हैं |
‘तस्मादिदं दैवातंत्रम व्यवस्य भरतर्षभ |’
(श्रीमद्भा०१/९/१७)
युधिष्ठिर ! ये कृष्ण साक्षात् भगवान हैं | ये ही सबके आदिकारण और परमपुरुष नारायण हैं | जिन्हें तुमने अपना सम्बन्धी, सखा, मित्र समझा और सारथि तक बनाया, वे साक्षात् परमात्मा हैं, परब्रह्म हैं | मनुष्य भगवान को पहचान ही नहीं पता है, परन्तु वे किसी भी रूप में अपने भक्तो की रक्षा के लिए आ पहुँचते हैं | केवल कुछ संत और साधक ही प्रभु की कृपा से ही प्रभु को पहचान पते हैं, उनकी कृपा की अनुभूति कर पाते हैं |
युधिष्ठर के पूछने पर भीष्मपितामहने धर्म के अनेक रहस्य बताये | उन्होंने निवृत्ति एवं प्रव्रत्तिधर्म, दानधर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म और भगवद-धर्मकी व्याख्या की | भीष्म धर्मका प्रवचन कर ही रहे थे कि उत्तरायणका समय आ पहुंचा | उस समय भीष्मने वाणीका संयम करके मनको सब ओरसे हटाकर अपने सामने स्थित भगवान श्रीकृष्णमें लगा दिया और बड़े प्रेमसे भगवानकी स्तुति की |
भीष्म ने कहा – मैं अपनी बुद्धि यदुवंशशिरोमणि भगवान श्रीकृष्णके चरणोंमें समर्पित करता हूँ | भीष्मने भगवानके श्रीविग्रहका बहुत ही सुन्दर वर्णन किया | युद्ध के समय भगवानके मुखकी छवि, गोपियों के साथ की गयी रास-लीला आदिका अति सुन्दर चित्रण करते हुए भीष्म ने कहा कि वे ही मृत्युके समय मेरी आँखों के सामने खड़े हुए हैं | उन्होंने अपने तन, मन, बुद्धिको भगवानमें लीन कर दिया | उनके प्राण वहीँ विलीन हो गए और वे शांत हो गये | उन्हें अनन्त ब्रह्ममें लीन जानकर सब लोग चुप हो गए | युधिष्ठर ने मृत शरीर की अंतेष्टि-क्रिया करायी | इसके बाद श्रीकृष्ण के साथ युधिष्ठर हस्तिनापुर चले आये | धृतराष्ट्रकी आज्ञा एवं भगवान श्रीकृष्ण की अनुमति से युधिष्ठिर साम्राज्य का धर्मपूर्वक शासन करने लगे | युधिष्ठिर के राज्य में प्रकृति पूरी तरह अनुकूल थी | न अतिवृष्टि थी, न अनावृष्टि और न ही किसी प्रकार का अकाल | गौएँ भरपूर दूध देती थीं, सर-सरिता-सरोवर सदैव जलसे परिपूर्ण रहते थे | प्रजा धर्मानुकुल चलती थी | चारों और सुख, शांति, अमन, चैन था | क्यों न हो ! राजा धर्म एवं नीतिपर चलेगा तो प्रजा भी चलेगी और तब भगवान उस राज्य पर सुख-शांति की वर्षा करेंगे | आज के शासक नीति और धर्म पर नहीं चल रहे है, इसलिए प्रकृति अब उनके अनुकूल नहीं रह रही है और दुनिया में सुख-शांति के स्थान पर कलह, क्लेश का बाहुल्य है | अतः आजके शासकों को भागवत के इस वृतांत से शिक्षा लेनी चाहिए |
भगवान श्रीकृष्ण का द्वारका के लिए प्रस्थान
अपने बंधुओंका शोक दूर करनेके लिए और अपनी बहन सुभद्रा की प्रसन्नताके लियें भगवान कई महीनोतक हस्तिनापुर में रहे | फिर युधिष्ठिर से अनुमति लेकर भगवान ने द्वारकाके लिए प्रस्थान किया | भगवान रथ पर विराजमान हुए | अर्जुन ने भगवान का श्वेत छत्र अपने हाथ में लिया | उद्धव और सात्यकि चँवर डुलाने लगे | भगवान को जाते देख सभी विह्वल हैं | सभी सोचमग्न हैं कि आजतक तो प्रभु हमारे साथ थे, जिनका दर्शन, सान्निध्य हमें नित्य प्राप्त था, आज वे ही भगवान हमसे दूर जा रहे हैं | भगवान यदि जीवन से चले जाएँ तो फिर शेष बचता ही क्या है ? यह सोच-सोचकर पुरवासी, दुखी एवं व्यथित हो रहे हैं | रमणियाँ अटारियों पर चढ़कर भगवान की छवि को निर्निमेष निहार रही हैं | भगवान मंद-मंद मुस्कुराते हुए सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए चले जा रहे हैं | कुछ ही क्षणोंमें वे सबकी आँखोंसे ओझल हो जाते हैं | शेष रह जाती हैं तो केवल उनके साथ बिताये क्षणोंकी मधुर स्मृतियाँ |
द्वारका पहुँचनेपर भगवान का राजोचित स्वागत हुआ | पूरी द्वारका नगरी आनन्दसागरमें डूब गयी | पुरवासी भगवान के दर्शन पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए | भगवान सबसे पहले माता-पिता के महलमें गये | वहाँ उन्होंने देवकीसहित सभी माताओं को प्रणाम किया | फिर उनकी आज्ञा लेकर उन महलोंमें गए जहाँ सोलह हज़ार रानियाँ निवास कर रहीं थीं | भगवान ने अनेक रूप धारणकर एक साथ सभी रानियोंके कक्षों में प्रवेश किया | दीर्घ अन्तराल के बाद भगवान का सान्निध्य पाकर सभी रानियाँ आनन्दित हुई |
यहाँतक प्रथम स्कंध के ग्यारहवें अध्याय की कथा पूर्ण हुई | बारहवें अध्यायमें परीक्षित के जन्म की कथा है | उत्तरा ने बालकको जन्म दिया | यही बालक आगे चलकर महान धर्मनिष्ठ राजा परीक्षित के नामसे प्रसिद्ध हुआ |
तेरहवें अध्याय में विदुरजीके उपदेश से धृतराष्ट्र एवं गांधारी के वन में जानेका वृत्तान्त है | विदुरजी तीर्थयात्रा में महर्षि मैत्रेयसे आत्मज्ञान प्राप्त करके हस्तिनापुर लौट आते हैं | धर्मराज युधिष्ठिर एवं धृतराष्ट्रसहित सभी को बड़ी प्रसन्नता होती है | विदुरका बहुत आदर-सत्कार होता है | भोजन एवं विश्राम के बाद जब विदुर सुखपूर्वक आसनपर बैठे तब युधिष्ठिरने विदुरजीसे उनकी तीर्थयात्राका वृतांत पूंछा और कहा कि आप द्वारका भी गये होंगे, हमें वहाँके हमारे भाई-बन्धु यादवलोगों एवं भगवान श्रीकृष्णका कुशल-समाचार सुनाइये | विदुरजीने तीर्थों एवं यदुवंशियोंके बारेमें सब कुछ बता दिया, केवल यदुवंशके विनाशकी बात नहीं कही, क्योंकि वे पाण्डवोंको दुखी नहीं देख सकते थे | इसलिए वह तो स्वयं ही प्रकट होनेवाली थी |
धृतराष्ट्र, गांधारी और विदुरका वनगमन
काल की गति को जानकर महात्मा विदुरने अपने भाई धृतराष्ट्रसे कहा – ‘हम सबके सिरपर काल मंडराने लगा है, जिसके टालनेका कोई उपाय नहीं है | आपके चाचा, ताऊ, भाई, पुत्र सभी मारे गये हैं | आप वृद्ध हो गये हैं | पराये घर में पड़े हुए हैं | जिनको आपने आग में जलानेकी चेष्टा की, विष देकर मार डालना चाहा, भरी सभा में जिनकी विवाहिता पत्नीको अपमानित किया, जिनकी भूमि और धन छीन लिया, अब उन्हींके घरका अन्न खा रहे हैं | विविध प्रकारके सुस्वादु व्यंजनोंके उपभोग एवं भोग-विलासमें आप सब कुछ भूल गये हैं आपके अज्ञानकी तो हद हो गयी | अब आप ममता का बंधन छोड़िये और कुटुम्बियोंसे छिपकर उत्तराखंड में चले जाइये |’ विदुरकी बातोंसे अंधे धृतराष्ट्रके प्रज्ञानेत्र खुल गये एवं वे गांधारीके साथ विदुरका अनुगमन करते हुए घरसे निकल पड़े |
युधिष्ठिर का शोक और नारदजी द्वारा उन्हें ज्ञानोपदेश
जब युधिष्ठिरसहित सभी लोगोंको मालूम हुआ कि धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर चले गये हैं तो सबको भारी दुःख हुआ | वे अनेक प्रकारसे शोक कर ही रहे थे कि इतने में नारदजी वहाँ आ पहुँचे | नारदजीने युधिष्ठिरसहित सभीको समझाते हुए कहा-
मा कंचन शुचो राजन् यदीश्वरवशं जगत्|
लोकाः सपाला यस्येमे वहन्ति बलिमीशितुः|
स संयुनक्ति भूतानि स एव वियुनक्ति च ||
धर्मराज ! तुम किसीके लिये शोक मत करो, क्योकि यह सारा जगत ईश्वर के आधीन है | सारे लोक और लोकपाल विवश होकर ईश्वरकी आज्ञा का पालन करते हैं | वही एक प्राणी को दुसरे से मिलाता है और वही उन्हें अलग करता है | फिर नारदजी ने कहा- जैसे संसार में खिलाड़ी की इच्छा से ही खिलोनों का संयोग-वियोग होता है, वैसे ही भगवान की इच्छा से ही मनुष्यों का मिलना-बिछुड़ना होता है-