तीन चरणों की अनंत सार्मथ्य
गायत्री को त्रिपदा कहा गया है, उसके तीन चरण हैं ।। इनमें से प्रत्येक चरण तीन लोकान्तरों तक फैला हुआ है ।। उसके माध्यम से आत्मा की गति केवल इसी लोक तक सीमित नहीं रहती वरन् वह अन्य लोकों तक अपना क्षेत्र विस्तृत कर सकता है और वहाँ उपलब्ध साधनों से लाभान्वित…
शक्ति की अधिष्ठात्री त्रिपदा गायत्री
संसार के समस्त दुःखों के तीन प्रधान कारण हैं- (1)अज्ञान, (2) अभाव, (3) अशक्ति ।। सत्, रज, तम, की त्रिविधि प्रकृति से मनुष्य का निर्माण हुआ है। वस्तुतः सत्ता दो की है ।। सत् और तम की ।। रज की उत्पत्ति तो दोनों की सम्मिश्रण से होती है ।। दुःखों के कारणों…
गायत्री और ब्रह्म की एकता
गायत्री कोई स्वतंत्र देवी- देवता नहीं है ।। यह तो परब्रह्म परमात्मा का क्रिया भाग है ।। ब्रह्म निर्विकार है, अचिन्त्य है, बुद्धि से परे है, साक्षी रूप है, परन्तु अपनी क्रियाशील चेतना शक्ति रूप होने के कारण उपासनीय है और उस उपासना का अभीष्ट परिणाम भी…
गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन
नाभिपद्म भुवा विष्णेब्रह्मणानिर्मितं जगत् ।। स्थावरं जंगमं शक्त्या गायत्र्या एवं वै ध्रुवम॥ (विष्णोः) विष्णु की (नाभिपद्म भुवा) नाभि कमल से उत्पन्न हुए (ब्रह्मणा) ब्रह्मा ने (गायत्र्याः शक्त्या एव) गायत्री शक्ति से ही (स्थावरं जंगमं) जड़ तथा चेतन (जगत्)…
गायत्री महाविद्या
गायत्री साधना सदबुद्धि की आराधना- उपासना है ।। गाय को वेदों की माता- वेदमाता कहा जाता है ।। वेद शब्द का अर्थ है ”ज्ञान” ।। यह ज्ञान कल्याण (ऋक् ), पौरुष (यजु), क्रीड़ा (साम) एवं अर्थ (अथर्वण)- इन चार उपक्रमों के माध्यम से सृष्टि के हर जीवधारी…