चन्द्रवंश से कुरुवंश तक की उत्पत्ति
चन्द्रवंश से कुरुवंश तक की उत्पत्ति पुराणो के अनुसार ब्रह्मा जी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानन्दन पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरूरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरू हुए। पूरू के वंश में भरत और…
सम्पूर्ण महाभारत ~ संक्षिप्त कथा !
महाभारत संक्षिप्त कथा हम सब ने बचपन से लेकर आज तक कभी न कभी महाभारत की किसी न किसी कहानी या पत्रों के बारे में अवश्य ही पढ़ा और सुना होगा, इस ग्रन्थ की महानता और विशालता का अनुमान महाभारत के प्रथम पर्व में उल्लेखित एक श्लोक से लगाया जा सकता है जिसका…
वीर कर्ण की नीति निष्ठां
कर्ण कौरवों की सेना में होते हुए भी महान धर्मनिष्ठ योद्धा थे। भगवान श्रीकृष्ण तक उनकी प्रशंसा करते थे। महाभारत युद्ध में कारण ने अर्जुन को मार गिराने की प्रतिज्ञा की थी। उसे सफल बनाने के लिए खांडव वन के महासर्प अश्वसेन ने यस उपयुक्त अवसर समझा। अर्जुन…
भीष्म पितामह और शरशैया
महाभारत में भीष्म जब बाणों की शय्या पर थे तो एक अद्भुत प्रेरक घटना हुयी : महाभारत का युद्ध अंतिम दौर में था। भीष्म पितामह शरशैया पर लेटे थे। युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ उनके चरणों के समीप बैठे उनका धर्मोपदेश सुन रहे थे। तभी द्रौपदी वहां उपस्थित…
अर्जुन का अहंकार
एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनको श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर…
परीक्षित का जीवन मोह
राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनाते हुए शुकदेव को छह दिन बीत गए और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा का शोक और मृत्यु का भय कम नहीं हुआ। तब शुकदेवजी ने राजा को एक कथा सुनाई – ‘राजन, एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया…
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ अथाष्टादशोऽध्यायः- मोक्षसंन्यासयोग
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ अथाष्टादशोऽध्यायः- मोक्षसंन्यासयोग भगवान श्रीकृष्ण प्रत्येक इंसान से विभिन्न विषयों पर प्रश्न करते हैं और उन्हें माया रूपी संसार को मन से त्यागने को कहते हैं, भगवान का कहना है कि पूरी जिंदगी सुख पाने का एक और केवल एक ही रास्ता है…
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ सप्तदशोऽध्यायः- श्रद्धात्रयविभागयोग
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ सप्तदशोऽध्यायः- श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय) अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण!…
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ षोडशोऽध्यायः- दैवासुरसम्पद्विभागयोग
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ षोडशोऽध्यायः- दैवासुरसम्पद्विभागयोग (दैवीय स्वभाव वालों के लक्षण) श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे भरतवंशी अर्जुन! परमात्मा पर…
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ पञ्चदशोऽध्यायः- पुरुषोत्तमयोग
श्रीमद्भगवद्गीता:-अथ पञ्चदशोऽध्यायः- पुरुषोत्तमयोग (संसार रूपी वृक्ष का वर्णन) श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी…