मॉस, मैथुन, मदिरा का क्यों करते है अघोरी प्रयोग:-

“मां काली” के विकराल रूप को देखकर कोई भी इंसान भयभीत हो सकता है लेकिन समस्त देवी-देवताओं में से मां काली को ही एक ऐसी देवी के नाम से जाना जाता है, जिनके क्रोध को शांत करना बेहद मुश्किल है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है तंत्र साधना में लिप्त अघोरी मां काली को प्रसन्न करने की कोशिश क्यों करते हैं? अघोरी, जो तंत्र साधना को अपना धर्म मानते हैं वह भगवान शिव के साथ-साथ काली को प्रसन्न करने उनसे शक्तियां हासिल करने को ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानते हैं। यहां काली एक साधारण देवी नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड को आच्छादित करती हैं। काली की पूजा साधारण या परंपरागत पूजा से बिल्कुल भिन्न होती है। अघोरी यह मानते हैं कि इस दुनिया में जो कुछ भी है वह शिव और काली का ही अंग है और अंत में उन्हीं में जाकर मिल जाएगा। इसलिए इस ब्रह्माण्ड की कोई भी चीज अशुद्ध नहीं है।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिलाओं को कमजोर समझा जाता है लेकिन मां काली का स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि स्त्री अगर चाहे तो वह ताकतवर से ताकतवर व्यक्ति को भयभीत कर सकती है। काल या समय को मात देने वाली ‘काली’ एक दैवीय शक्ति हैं, जिन्होंने युद्ध में अपने सामने आने वाले हर शत्रु का मजबूती से सामना किया है।अघोरी शिव या महाकाल की पूजा के साथ-साथ उनके स्त्री स्वरूप काली या मृत्यु की देवी की आराधना करते हैं।
अन्य साधुओं के लिए मांस, मदिरा या शारीरिक संबंध जैसी चीजें पूरी तरह निषेध होती हैं लेकिन अघोरी या तंत्र साधकों द्वारा की जाने वाली अराधना की यह मुख्य शर्ते होती हैं। अघोरियों के दृष्टिकोण से मांस का सेवन यह साबित करता है कि सीमा शब्द उनके लिए मायने नहीं रखता और सब कुछ एक ही धागे से बंधा हुआ है। इसलिए वे इंसान के मांस के साथ-साथ उसके रक्त का भी सेवन करते हैं। बहुत से अघोरी अपनी साधना पूरी करने के लिए मृत शरीर के साथ संभोग भी करते हैं और साथ ही स्वयं मदिरा का सेवन कर अपने आराध्य को भी वह अर्पण करते हैं।
अब प्रशन यह उठता है की आखिर अघोरी इन वस्तुओं का प्रयोग करते क्यों है ?
तांत्रिक ग्रंथो के अनुसार मांस, मदिरा, मत्स्य, मैथुन, मुद्रा के प्रयोग से ही अघोर तंत्र शक्तियां प्राप्त की जाती है और इन्ही पांच चीजो को तंत्र भाषा में ‘पंच मकार’ भी कहते है | परन्तु प्रत्येक व्यक्ति को यह ध्यान रखना आवश्यक है की इन वस्तुओ का प्रयोग केवल अघोर दीक्षा प्राप्त योगी ही कर सकते है जिन्हें अघोरी या औघड़ कहते है, संसारी लोगो को इनका सेवन और प्रयोग दोनों ही वर्जित है |
तंत्र के दक्षिण मार्ग में इन वस्तुओ को पूरी तरह त्याग कर आगे बढा जाता है लेकिन तंत्र के वाम मार्ग में इन्ही वस्तुओ का हर्ष पूर्वक प्रयोग कर इनकी इच्छा समाप्त कर दी जाती है और यह केवल देव शक्तियों को चढाने का एक प्रसाद भर रह जाते है लेकिन यह अत्यंत ही कठिन मार्ग है और बिना गुरु के इस मार्ग पर नहीं चला जा सकता |
हिन्दू धर्म के अंतर्गत 10 ऐसी देवी-देवता हैं जो अघोरियों को पारलौकिक ताकतें प्रदान करती हैं, काली उन्हीं में से एक देवी हैं।अघोरी, अपनी आराध्या मां काली की पूजा तीन स्वरूपों में करते हैं, भैरवी, बगलामुखी और धूमवती। इसके अलावा भगवान शिव को वे भैरव, महाकाल और वीरभद्र के रूप में पूजते हैं।हिंगलाज माता अघोरियों की संरक्षक मानी जाती हैं।पौराणिक दस्तावेजों और मान्यताओं के अनुसार शक्ति के रूप में काली ही ब्रह्माण्ड को सुचारु रूप से चलाती हैं।अघोरी साधु काली की पूजा इसलिए भी करते हैं क्योंकि काली को मोक्ष प्रदान करने वाली भी कहा जाता है|