सिद्धि करने का समय
यह यक्षिणी रात्रि के तीसरे पहर में सिद्ध की जाती है, रात्रि को नियमित समय पर श्मशान भूमि में जाने और सुष्मणानाड़ी के चलते समय वट वृक्ष के ऊपर चारासें ओर से एकाग्रचित्त करके नीचे लिखे मनत्र का पाँच हजार बार जाप नित्य करें ।
मन्त्र
ॐ ह्रीं क्लीं महा यक्षिणी प्रदात्र्यै नमः ।
महायक्षिणी का आगमन यह यक्षिणी कई रूप धारण कर साधक को भयभीत करता है। आने का समय भैंसे का रूप धारण कर लेती है। जिस समय यह आती है प्रथम अंधकार और आँधी लाती है और हवा बड़े वेग से चलती है। बादल की घटा इतनी जोर की चारों ओर उठती हुई दिखाई देती है कि हाथों हाथ कुछ नहीं दिखाई देता। फिर एक दम उजाला हो जाता है फिर काले रंग के बाल बिखेरे हुए एक स्त्री नाचती हुई आती है जिसके दाँत आगे निकले हुए, सिर पर लाल रंग का कपड़ा लिपटा हुआ, मस्तक पर सिंदूर का टीका लगा हुआ, जिसकी सूरत देखते ही यह अनुमान हो जाता है कि काल की यही निशानी है ।
ऐसे अनेक उपद्रव एक सप्ताह तक, बराबर होते रहते हैं। यदि साधक भयभीत न हुआ तो फिर महायक्षिणी अपना दर्शन देतीं हैं।