तृतीय स्कंध
तृतीय स्कंधका प्रारम्भ उद्धव एवं महात्मा विदुरकी भेंटकी कथासे होता है | द्वितीय स्कंधके अंतमें शौनकजी ने सूतजी से पूछा था कि हमें महात्मा विदुरजीका चरित्र सुनाइये और महात्मा विदुरको मैत्रेयजीने क्या उपदेश दिया, यह बताइये | ठीक ऐसा ही प्रश्न राजा राजा परीक्षितने शुकदेवजीसे पूछा, जिसका उत्तर वे दे रहे हैं |
महात्मा विदुरका हस्तिनापुरसे जाना
परीक्षित सुनो, यह उन दिनोंकी बात है, जब कौरवोंने पाण्डवो को मारने के लिए अनेक छल-प्रपंच रचे | लाक्षागृहमें भेजकर आग लगवा दी गयी | द्रौपदीको भरी सभा में निर्वस्त्र करने का दुस्साहस किया गया | द्यूत-क्रीडा में छलपूर्वक हराकर बारह वर्षोंके वनवास एवं एक वर्षके अज्ञातवासका दण्ड दिया गया | जब वनवासकी अवधि पूर्णकर पाण्डव हस्तिनापुर लौटे और उन्होंने अपना न्यायोचित हिस्सा माँगा तो दुर्योधनने देने से इनकार कर दिया | बहुत कोशिश की गयी कि किसी तरह दुर्योधन मान जाय और युद्धकी नौबत नहीं आये, किंतु दुर्योधन अपनी जिद्पर अड़ा रहा | अंतिम प्रयासमें भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पाण्डवदूत के रूपमें कौरवोंकी सभामें गये और पाण्डवोंकी गुजर-बसरहेतु केवल पाँच गाँव माँगे, किंतु दुर्योधनने कहा कि बिना युद्धके तो मैं सुईकी नोंकपर आ सकनेवाली जितनी भूमि भी नहीं दूंगा | उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को अपमानित भी किया | भगवान सभा से वापस चले आये |
फिर धृतराष्ट्र ने सलाहके लिए विदुरको बुलाया | विदुरने धृतराष्ट्र के पूछनेपर उन्हें जो सम्मति दी, उसे नीति-शास्त्रके जानकार ‘विदुर-नीति’ कहते हैं |
महात्मा विदुरने कहा- ‘आप अजातशत्रु युधिष्ठिरको उनका हिस्सा दे दीजिये, दुर्योधनकी बात मत मानिये | वह तो आपके घरमें पापरूप धरकर आया है | इसकी हाँ-में-हाँ मिलायेंगे तो आपका कुल विनाशको प्राप्त होगा | अतएव यदि आप कुशल चाहते हैं तो इस दुष्टको तुरंत त्याग दीजिये |’
महात्मा विदुरकी यह बात सुनकर कर्ण, दुशासन और दुर्योधन आगबबूला हो गये और विदुरका तिरस्कार करते हुए बोले – ‘अरे इस कुटिल दासीपुत्र को किसने बुलाया है, जिनके टुकड़े खाकर यह जीता है, उन्हींके प्रतिकूल होकर शत्रुका काम बनाना चाहता है | इसे नगरसे तुरंत बाहर निकाल दो |’ इन अत्यंत कठोर वचनों से मर्माहत होकर भी विदुजी ने कुछ बुरा न माना और भगवान की माया को प्रबल समझकर अपना धनुष राजद्वारपर रख वे हस्तिनापुरसे चल दिये | विदुरने इसे भी भगवानका अनुग्रह माना | उन्होंने सोचा कि दुर्योधन की निंदा के माध्यम से भगवान ही मुझे कौरवों का कुसंग छोड़ने का आदेश दे रहे हैं | यह प्रभु-प्रेरणासे ही हो रहा है | संत और महापुरुष अपमान एवं निंदा में भी भलाई खोज लेते हैं | सच्चा भक्त हर परिस्थितिमें भगवान की कृपाकी अनुभूति करता है | मनुष्य के लिए बहुत सुन्दर संकेत यह है कि हर घटना को प्रभुका प्रसाद माने और उसे भगवान की इच्छा जानकर स्वीकार करे ऐसी सोच व्यक्ति के जीवन में यदि हो जाएगी तो वह कभी अशांत, उद्विग्न, संतापित एवं दुखी नहीं होगा | भागवत-महापुराणकी हर घटना, हर प्रसंग, हर वृतांत मनुष्य को जीने की राह बताता है, जीवन जीने की कला सिखाता है | भगवान ने सोचा कि कौरवों के साथ विदुर रहेंगे तो कौरवों का विनाश न हो सकेगा | इसलिए प्रभु की इच्छा से ही वह सब घटित हुआ |
परिवार में जबतक कोई संत-सदृश व्यक्ति, कोई परम वैष्णव, कोई भगवद्भक्त रहता है, तबतक उस परिवार पर न तो कोई आपत्ति-विपत्ति आ सकती है, न कोई अहित हो सकता है और न ही ऐसे परिवार का विनाश हो सकता है | इतिहास, धर्मग्रन्थ एवं पौराणिक आख्यानोंसे मनुष्यको बहुत कुछ सिखने को मिलता है जबतक विभीषण रावण के साथ रहे, तबतक रावण, उसका परिवार एवं साम्राज्य सुरक्षित रहा | जबतक विदुर धृतराष्ट्र के साथ रहे, तबतक उसका परिवार विनाश से बचा रहा, लेकिन जैसे ही रावण ने विभीषण को अपमानितकर अपने राज्य से निकाला और दुर्योधन ने विदुरका मान-मर्दनकर राज्यसे निकाला, वैसे ही दोनों के कुलों के विनाश के बीज अंकुरित होने शुरू हो गये | अतएव परिवार के किसी भी सदस्यको इस प्रकार अपमानित मत करो, विशेषकर सज्जन, संत, भक्त सदस्यको तो भूलकर भी परिवार से अलग मत होने दो, नहीं तो पूरा कुल अधर्म-पथगामी हो जायेगा और अन्ततः विनाशको प्राप्त होगा |
विदुरकी उद्धवजीसे भेंट
विदुर हस्तिनापुर से चलकर भारतवर्ष के अनेक पुण्य तीर्थोंमें विचरने लगे | विचरते-विचरते जबतक वे प्रभास-क्षेत्रमें पहुँचे, तबतक भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से महाराज युधिष्ठिर पृथ्वीका एकछत्र अखण्ड राज्य करने लगे थे | जब विदुरने अपने कौरव-बंधुओंके विनाशका समाचार सुना तो वे शोक करते हुए सरस्वती के तीरपर आये, वहाँ उन्होंने विभिन्न तीर्थों का सेवन किया | फिर वहाँ से वे यमुनातट पहुँचे, वहाँ उनकी उद्धवजीसे भेंट हुई | दोनों एक-दुसरेसे बड़े प्रेमसे मिले | विदुरजी ने बड़ी उत्सुकता से भगवान श्रीकृष्ण, वसुदेवजी, महाराज उग्रसेनसहित सभी की कुशलताके बारे में जानने की इच्छा प्रकट की और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं एवं मनमोहक चरितोंके श्रवण करनेकी उत्कंठा व्यक्त की | यह सुनकर उद्धवजी अत्यधिक भाव-विह्वल हो गये चूँकि तबतक भगवान श्रीकृष्ण लीला-संवरण कर चुके थे, अतएव उनके नेत्रोंसे आंसुओंकी धारा बहने लगी | बड़ी देर बाद उन्होंने अपने-आपको संभाला और विदुरजीसे कहने लगे-
विदुरजी श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे हमारे घरों को काल ने डस लिया है, वे सब श्रीहीन हो गये हैं | उनकी क्या कुशल सुनाऊ ? उद्धवजी भगवान की लीलाओं एवं उनकी कृपाओंको याद करके बड़े भाव-विह्वल हुए | उन्होंने विस्तारसे प्रभुकी लीलाओंका सरस वर्णन किया | फिर उन्होंने कहा कि मुझे प्रभासमें भगवानने भागवत-धर्मका उपदेश देकर बद्रिकाश्रम जानेकी आज्ञा दी थी | तब विदुरने कहा कि उस भागवत-धर्म को मैं सुनना चाहता हूँ | आप कृपया मुझे सुनाइये |
उद्धवजी बोले- जब भगवान ने मुझे यह उपदेश दिया, तब मैत्रेयऋषि वहाँ बैठे थे | कितने भाग्यशाली हैं आप विदुरजी निजधाम जाते समय भगवानने आपको याद किया और मैत्रेय ऋषि को आज्ञा दी कि जब विदुर तुम्हें मिलें तो इस भागवत-धर्मका उपदेश उन्हें देना | अतः मैं आपको यह उपदेश नहीं दे सकता | यह उपदेश तो आपको मैत्रेयऋषि ही देंगे, क्योंकि भगवान ने उन्हें यह कार्य सौंपा है विदुरजी यह ज्ञान कोई साधारण ज्ञान नहीं है, बहुत महत्वपूर्ण ज्ञान है | ज्ञान की महत्ता बताने के लिए ही भगवान ने यह ज्ञान विदुरको मैत्रेय ऋषि के द्वारा कहलवाया है |
विदुरजीकी मैत्रेयऋषिसे भेंट
इस संवादके बाद उद्धव जी बद्रिकाश्रम को प्रस्थित हुए और विदुरजी मैत्रेय ऋषि से मिलने चल पड़े | वे गंगाके किनारे मैत्रेय ऋषि के आश्रम में आये | उन्होंने मैत्रेय ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया | मैत्रेय जी ने कहा कि विदुरजी मैं आपको जनता हूँ | आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं, आप तो धर्मराज के अवतार हैं | माण्डव्य ऋषि के शाप के कारण ही आपका दासीपुत्र के रूपमें जन्म हुआ | आप भगवान तथा उनके भक्तों को अत्यंत प्रिय हैं, आप श्रीव्यासजीके औरस पुत्र हैं | आपका चित्त सदा भगवान में ही लगा रहता है |
विदुरजी ने बड़ी विनम्रतापूर्वक मैत्रेयजी से कहा-
सुखाय कर्माणि करोति लोको
न तै: सुखं वान्यदुपारमं वा |
विन्देत भुयस्तत एव दुःखं
यदत्र युक्तं भगवान व्देन्न: ||
(श्रीमद्भा० ३/५/२)
भगवन संसार में सब लोग सुख के लिए कार्य करते हैं, परन्तु उनसे न तो उन्हें सुख ही मिलता है और न उनका दुःख ही दूर होता है, बल्कि उससे भी उनके दुःखकी ही वृद्धि होती है | अतः इस विषय में क्या करना उचित है, यह आप कृपाकर मुझे बतलाइये |
विदुरजी ने बहुत ही सुन्दर प्रश्न पूछा उन्होंने अपने हितके लिये नहीं पूछा लोकहित, संसारहित के लिये मैत्रेयजीसे यह प्रश्न पूछा है | संसार में हर व्यक्ति सुख की खोज में लगा है, वह सुख के लिए ही सारे साधन जुटा रहा है | निरंतर आपाधापीमें लगा है, परन्तु वह उनसे सुख नहीं प्राप्त कर पा रहा है | अपितु हो यह रहा है कि जैसे-जैसे साधन और संग्रह बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे दुखोंमें भी वृद्धि होती जा रही है | अतः विदुरजी जानना चाहते हैं कि मनुष्य को क्या करना चाहिए, जिससे उसके जीवन में दुखोकी निवृत्ति हो और सुखकी प्राप्ति हो |
असल में सुखके बजाय व्यक्तिको जो दुःख प्राप्त हो रहा है, उसका कारण यह है कि व्यक्तिकी खोज ही गलत है | उसकी दिशा सही नहीं है | जो चीज जहाँ है वहीँ तो मिलेगी | सांसारिक पदार्थोमें मनुष्य सुख खोज रहा है, जबकि वहाँ सुख है ही नहीं, वह तो आत्मामें, परमात्माके सान्निध्यमें है, मनुष्यके अंतर्मनमें है | अतः जब वहाँ पहुँचा जायगा, तभी तो सुख-शांति प्राप्त हो सकेगी | भौंरा यदि कंकड़-पत्थरोंमें रस ढूंढेगातो वहाँ मिलेगा क्या ? जब रस उसमें है ही नहीं तो मिलेगा कैसे ? रस तो फूलोंमें है, पुष्पोंके अन्दर है | उनमें वह खोजेगा तो अवश्य मिलेगा | ठीक इसी प्रकार मनुष्यकी सुखकी खोजकी दिशा एवं स्थान ही गलत है | अतः स्थान एवं दिशामें परिवर्तन करना होगा |
ज्ञान-प्राप्तिके लिये मनुष्यको अपनी पात्रता सिद्ध करनी पड़ती है और ज्ञान-पिपासाको प्रकट करना होता है | उपर्युक्त प्रश्न पूछकर विदुरजी इन दोनों ही मानदण्डोंपर खरे उतरे हैं | अतः अब मैत्रेयजी विदुरजीको वह भागवत-धर्म बता रहे हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण स्वधामगमनके पूर्व उन्हें बताने को कह गये थे | उसी धर्म, उसी महाज्ञानकी चर्चा मैत्रेयजी करने जा रहे हैं | विदुरजीके इस प्रश्नके उत्तरमें ही सम्पूर्ण भागवत-ज्ञान समाया हुआ है |
सृष्टिक्रम-वर्णन
मैत्रेयजी कहते हैं कि जगत, जीव एवं जगदीश्वरका सच्चा ज्ञान होनेपर मनुष्यकी सोच में परिवर्तन आयेगा और वह सुख-शांति की सही दिशा में अग्रसर हो सकेगा | भागवत ऐसे ही ज्ञान की त्रिवेणी है, उसमें अवगाहन करनेसे मनुष्यके त्रितापोंका शमन होता है और वह परमानन्द की अनुभूति करता है | इसी भागवत-धर्म का वर्णन करना मैत्रेय जी प्रारम्भ करते हैं |
मैत्रेय जी कहते हैं कि सृष्टि-रचनाके पूर्व केवल परमात्मा ही थे, न तो कोई द्रष्टा (देखनेवाला) था और न ही कोई द्रश्य | द्रष्टा और द्रश्य को प्रकट करने वाली शक्ति भगवान की माया है | इस मायामें परमात्माने अपने अंश पुरुष रूप से चिदाभासरूप बीज स्थापित किया, तब उस अव्यक्त मायासे महत्तत्त्व प्रकट हुआ | महत्तत्त्व से अहंकार की उत्पत्ति हुई | अहंकार से मन और ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं | इन सबके समन्वयसे भी जब जीव की रचना संभव नहीं हुई तब महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, पंचतन्मात्रा और मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ- इन तेईस तत्वोंके समुदायमें भगवान स्वयं प्रविष्ट हो गये, तब उनसे अधिपुरुष विराट उत्पन्न हुआ | इससे स्पष्ट होता है कि केवल इन विविध तत्त्वों के संयोगमात्र से जीव उत्पन्न नहीं हो सकता | जबतक परमात्मा उसमें प्रवेश नहीं करेंगे, तबतक प्राणी की उत्पत्ति संभव नहीं है | अतः स्पष्ट है कि सभी जीवों में परमात्मा विराजमान हैं | सब उसीके रूप हैं | हमारे सभी ग्रन्थ सभी जीवों को एक ही परमात्माकी संतान मानते हैं | मनुष्यमें समानता एवं भाईचारा का भाव दिखाता है भागवत | आज इस दिव्य सन्देशकी सारे संसार को आवश्यकता है |
सृष्टिक्रमके वर्णन को आगे बढ़ाते हुए मैत्रेयजी कहते हैं कि भगवानकी नाभि से एक कमल उत्पन्न हुआ, उसमें से ब्रह्माजी प्रकट हुए | भगवान के आदेशानुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ किया | सबसे पहले मनु और शतरूपा जन्मे | उस समय पृथ्वी जलमें डूबी हुई थी, अतः ब्रह्माजीको चिंता हुई कि सृष्टि का विस्तार होगा तो प्राणी कहाँ रहेंगे | ऐसा विचार जब ब्रह्माजी कर रहे थे, तभी उनकी नासिकामेंसे एक वाराह-शिशु निकला, जो बाहर आकर विराट हो गया | यह भगवान का वाराह-अवतार था | वाराहभगवान समुद्र में डूबी पृथ्वी को बाहर निकालकर लाये | हिरण्याक्षने विरोध किया | भगवान ने उसका वध किया | हिरण्याक्षका नाम सुनकर विदुरजी ने पूछा कि कृपया इस हिरण्याक्ष के बारे में भी कुछ बताइये |
हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपुके जन्मकी कथा
मैत्रेयजी बोले कि विदुरजी कश्यपऋषि की पत्नी दिति एक बार सायंकालके समय पुत्रप्राप्तिकी कामनासे उनके पास पहुंची | कश्यपजीने समझाया कि संध्याकालमें सहवास शास्त्रविरुद्ध है, किंतु वह नहीं मानी | कश्यपजीने भी दैवको प्रबल मानकर दितिकी इच्छा पूर्ण की | पुनः स्नानादिसे पवित्र हो वे भगवानका ध्यान करने लगे | इधर दितिको भी उस निन्दित कर्मसे बड़ी ग्लानि हुई | कश्यपजीने कहा कि उस तुम्हारे गर्भमें दो दैत्य आये हैं | यह सुनकर दिति बहुत घबरायी, पर ऋषिने कहा कि उनका वध करने के लिये भगवान आयेंगे तो उसे थोड़ी सांत्वना मिली | दितिके गर्भसे दो दैत्य-हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु पैदा हुए | हिरण्याक्ष का वध भगवान ने वाराह-अवतार लेकर किया और हिरण्यकशिपुका वध नृसिंह-अवतार लेकर किया |
यह सुनकर विदुरजी की जिज्ञासा और बढ़ी, उन्होंने जानना चाहा कि ये दोनों दैत्य कौन थे | तब मैत्रेयजीने बताया कि सनत्कुमारोंको भगवानके दरबारमें प्रवेश करनेसे रोकने के कारण द्वारपाल जय-विजय को उन्होंने शाप दिया कि तुम मृत्युलोक में जाकर दैत्य-योनीमें जन्म लोगे | सनत्कुमारोंको शापके कारण जय-विजयको हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपुके रूपमें जन्म लेना पड़ा | इस कथासे दो सुन्दर संकेत मिलते हैं, एक तो यह कि संतका अपमान भूलकर भी मत करो, दुसरे यह कि पति-पत्नीको अपनी मर्यादामें रहना चाहिये | संध्याके समय स्त्रीसंग नहीं करना चाहिए | एकादशी, पूर्णिमा, पवित्र दिनोंमें भी स्त्रीसंग वर्जित है | दाम्पत्य-जीवन केवल कामसुख भोगनेके लिए नहीं है, अपितु समाजको योग्य संतान देकर संसार-सागरसे पार जानेके लिए यह एक अनुपम नौका है |
कथा का क्रम जारी रखते हुए मैत्रेयजी कहते हैं कि जब जय-विजय सनत्कुमारोंको भगवानके पास जानेसे रोक रहे थे, जब द्वारपर कोलाहल सुनकर भगवान लक्ष्मी के साथ स्वयं बाहर आ गये | उन्होंने सनत्कुमारोंसे द्वारपालों द्वारा किये गये अपमान के लिये क्षमा माँगी | यहाँ भगवान बहुत सुन्दर बात करते हैं, जिसपर आजके राष्ट्रनायकों, शासकों/शासनाध्यक्षोंको विशेष ध्यान देना चाहिए और तदनुरूप अपने शासनतन्त्रमें बदलाव लाकर नौकरशाहीको लोक-व्यवहारमें प्रशिक्षित करना चाहिये |
भगवानका कपिल-अवतार
कथाको आगे बढ़ते हुए मैत्रेयजी कहते हैं कि स्वायम्भुव मनु एवं शतरूपाने ब्रह्माजीके आज्ञानुसार सृष्टि-उत्पत्ति प्रारम्भ की | उनके दो पुत्र हुए-प्रियव्रत और उत्तानपाद एवं तीन कन्याएँ हुईं-आकूति, देवहूति और प्रसूति | आकूतिका रुचिसे, देवहूतिका कर्दमसे और प्रसूतिका दक्षसे विवाह हुआ | कर्दम ऋषि और देवहूति के घर कपिल भगवान अवतरित हुए |
कर्दम ऋषि ब्रह्माजी की छाया से जन्मे थे | ब्रह्मा जी ने उन्हें आज्ञा दी कि तुम संतान उत्पन्न करो तो उन्होंने दस हज़ार वर्षों तक सरस्वती नदी के तीर पर तपस्या की | उच्च कोटि के सृजन, उत्कृष्ट संतान के लिये कठोर तपस्या करनी पड़ती है | बिना तप के श्रेष्ठ सृजन संभव नहीं है | कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर कर्दमको भगवानने दर्शन दिये |
भगवान बोले- ‘कर्दम तुमने बड़े आत्मसंयम से मेरी आराधना की है | तुम्हारे ह्रदय के उस भाव को जानकर मैंने पहले से ही उसकी व्यवस्था कर दी है |’
फिर भगवान ने कहा-
न वै जातु मृषैव स्यात्प्रजाध्यक्ष मदर्हणम् |
भवद्विधेष्वतितरां मयि संगृभितात्मनाम ||
(श्रीमद्भा० ३/२१/२४)
प्रजापते मेरी आराधना तो कभी भी निष्फल नहीं होती, फिर जिसका चित्त निरंतर एकान्त रूपसे मुझमें ही लगा रहता है, उन तुम-जैसे महात्माओं के द्वारा की हुई उपासना का तो और भी अधिक फल होता है भगवान के इस दिव्य सन्देश को हमें समझना चाहिए कि हर कार्य के प्रारम्भ करने के पूर्व परमात्मा की आराधना करनी चाहिये और श्रेष्ठ कर्म संपन्न होने हेतु उनसे आशीर्वाद माँगना चाहिये, इससे प्रभु बहुत प्रसन्न होते हैं और हमें उस कार्य को संपन्न करने हेतु अद्भुत शक्ति प्रदान करते हैं | बहुत बड़ी शक्ति है आराधना और प्रार्थना में | इसकी महत्ता को हर धर्म ने स्वीकारा है |
फिर भगवान बोले- ‘कर्दम स्वायम्भुव मनु महारानी शतरूपा के साथ तुमसे मिलने के लिए परसों यहाँ आयेंगे | वे अपनी सुन्दर सुशील और गुणों से संपन्न कन्या तुम्हें अर्पण करेंगे | तुम्हारा चित्त जैसी भार्या चाह रहा है, वह राजकन्या वैसी ही पत्नी होकर तुम्हारी यथेष्ट सेवा करेगी | तुम्हारा तेज़ धारणकर वह नौ कन्याएँ उत्पन्न करेगी और मैं भी तुम्हारी पत्नी देवहूति के गर्भ से अवतीर्ण होकर सांख्यशास्त्र की रचना करूँगा |’
विदुरजी यह कहकर भगवान अपने लोक को चले गये | महर्षि कर्दम भगवान के बताये हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए सरस्वती के किनारे अपने आश्रम में ठहरे रहे | इधर मनुमहाराज अपनी पत्नी शतरूपा के साथ कन्या देवहूति को लेकर उनके आश्रम पर पहुँचे | सरस्वती के जल से भरा यह सरोवर ‘बिंदु-सरोवर’ कहलाता है | यह वह स्थान है, जहाँ कर्दम के प्रति उत्पन्न हुई करुणा के वशीभूत हुए भगवान के नेत्रों से प्रेमाश्रुओंकी बूंदें गिरी थीं | यह बहुत पवित्र एवं प्रसिद्द तीर्थ है |
कर्दम ने मनु, शतरूपा एवं देवहूति को समुचित आसन दिए एवं मधुरवाणी से उनका स्वागत किया | मनुमहाराज बोले- ‘ऋषिवर यह मेरी कन्या है | जबसे नारद जी के मुँह से आपके शील, विद्या, रूप, आयु और गुणों का वर्णन इसने सुना है, तभी से यह आपको अपना पति बनाने का निश्चय कर चुकी है |’
फिर मनुने कहा-
तत्प्रतीच्छ द्विजग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया |
सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु ||
(श्रीमद्भा० ३/२२/११)
द्विजवर मैं बड़ी श्रद्धा से आपको यह कन्या समर्पित करता हूँ | आप इसे स्वीकार कीजिये | यह गृहस्थोचित कार्यों के लिए सब प्रकार से आपके योग्य है |
दाम्पत्य-जीवन काम-विलास के लिए नहीं है | यह तो मर्यादित काम को भोगकर काम-विनाश के लिए है | हमारी संस्कृति में पत्नी को धर्मपत्नी कहा गया है | जो पत्नी पतिको धर्म के मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करे, धर्म-कार्य में प्रवृत्त करे, वही सच्ची धर्मपत्नी है पत्नी संसार-सागर से पार जाने के लिए नौका है और पति नाविक है | दोनों के सहयोग, सामंजस्य से ही संसार-सागर से पार जाया जा सकेगा | नाविक के बिना नाव अकेली सागर को पार नहीं कर सकती और नाविक बिना नावके पार नहीं जा सकता | अतः पति-पत्नी दोनों को एक-दुसरे के महत्त्व को समझना चाहिए | आज की स्थिति तो सर्वथा इसके विपरीत दिखती है | ऐसा नहीं होना चाहिए | धर्मशास्त्रों से शिक्षा लेकर जीवन को तदनुरूप ढालकर समुन्नत बनाना चाहिये | पति-पत्नी पवित्र एवं आदर्श जीवन जियें तो उनके घर भगवान को भी जन्म लेने की इच्छा होती है |
माता-पिता के चले जाने के बाद पति के अभिप्राय को समझ देवहूति कर्दम जी की प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी | निरंतर सेवा में रत रहने एवं व्रत-उपवास करने से देवहूति कृशकाय हो गयी | बारह वर्षों तक दोनों ने ब्रह्मचर्य का पालन किया | एक दिन कर्दम ने देखा देवहूति बहुत दुर्बल हो गयी है | उसे दाम्पत्य-सुख अभीतक नहीं मिला है | उन्होंने अपने तप के बल से देवहूति का वैसा ही रूप-लावण्य ला दिया और योगबल से एक सर्वसुविधायुक्त विमान बनाया, जो इच्छानुसार सर्वत्र जा सकता था | यह जल, थल, नभमें विचरण करने में सक्षम था | इसमें कई खण्ड थे | हर खण्ड में अनेक सुसज्जित, सर्वसुविधायुक्त कक्ष थे | दीवारों पर अद्भुत शिल्प-रचना एवं चित्रकारी थी | विमानमें क्रीडास्थली, सरोवर, शयन-गृह, अतिथि-कक्ष, आँगन, चौक आदि थे |
इस अद्भुत विमानपर निवासकर कर्दम ने अपनी प्रिय पत्नी देवहूति के साथ सौ वर्ष तक विहार किया | इस अवधि में देवहूति के नौ कन्याएँ हुईं, किंतु पुत्र एक भी नहीं हुआ |
इसके बाद कर्दम संन्यास लेने के लिये तैयार हुए | तब देवहूति कर्दम से बोली-‘आपने वचन दिया था कि एक पुत्र के जन्म के बाद संन्यास लेंगे | शुकदेव जी कहते हैं कि देवहूति के द्वारा कर्दम को वचन की याद दिलाये जाने पर दोनों ने कई वर्षों तक भगवान की आराधना की, इसके बाद देवहूति के गर्भ में साक्षात् नारायण ने वास किया और शुभ मुहूर्त में भगवान कपिल अवतरित हुए | अब कर्दम संन्यास लेना चाह रहे थे, किंतु उन्हें नौ कन्याओं के विवाह की चिंता थी, जो उन्होंने ब्रहमजी के सामने प्रकट की | इसपर ब्रह्मा जी बोले कि जिसके घर स्वयं भrishionगवान आये हों और जो उन्हीं परमात्मा की आराधना में लीन रहता हो, सदैव उन्हीं का चिंतन करता रहता हो, उसे कोई चिंता करने की जरुरत नहीं, उसकी चिंता तो भगवान स्वयं करते हैं |’
गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने यही कहा है-
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ||
(गीता ९/२२)
जो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझे परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों के योगक्षेम की व्यवस्था मैं स्वयं करता हूँ |
ब्रह्मा जी नौ ऋषियों को साथ लाये | प्रत्येक ऋषि को एक-एक कन्या ब्रह्मा जी ने दी | अत्री को अनसूया, वसिष्ठ को अरुंधती आदि | फिर ब्रह्मा जी बोले- कर्दम तुमने मेरी आज्ञा का पालन कर सृष्टि-संरचना में सहयोग किया है, तुम मेरे श्रेष्ठ पुत्र हो |’ पिता की आज्ञा का पालन ही पुत्र का परम कर्तव्य है |
एतावत्येव शुश्रूषा कार्या पितरि पुत्रकै: |
बाढमित्यनुमन्येत गौरवेण गुरोर्वच: ||
(श्रीमद्भा०३/२४/१३)
महर्षि कर्दम ने सोचा कि अब कन्याओं का उत्तरदायित्व पूर्ण हो गया है तो वे कपिल के पास आये और कहा कि मुझे संन्यास लेना है | कपिल जी ने कहा कि आप निश्चिन्त होकर जाइये और परमात्मा में मन लगाइए | कर्दम ने संन्यास लिया और भागवत-चिंतन करते-करते मुक्त हो गये | पुत्र जब गृहस्थी का भार संभाल ले तो पिता को संन्यास-पथ पर अग्रसर होना चाहिये |
भगवान कपिल का माता देवहूति को ज्ञानोपदेश
मैत्रेय जी कहते है- विदुरजी पिता के वन में चले जाने पर भगवान कपिल माता का प्रिय करने की इच्छा से उस बिंदुसरतीर्थ में रहने लगे एक दिन कपिल कर्म-कलाप से निवृत हो आसन पर विराजमान थे, उस समय देवहूति ने उनसे कहा |
देवहूति बोली भगवान संसार की मोह माया के चक्कर से मैं ऊब गयी हूँ | इन्द्रियों ने मुझे बहुत भटकाया है | न तो मुझे कोई सुख मिला, न शांति और न ही आनन्द | मैं जानना चाहती हूँ कि संसार में मनुष्य के कल्याण का सच्चा साधन क्या है ? सच्चे सुख एवं आनन्द की प्राप्ति मनुष्य को कैसे संभव हो सकती है ?
भगवान कपिल ने कहा –
योग आध्यात्मिक: पुंसां मतो नि:श्रेयसाय मे |
अत्यन्तोपरतिर्यत्र दुःखस्य च सुखस्य च ||
(श्रीमद्भा०३/२५/१३)
माता यह मेरा निश्चय है कि अध्यात्म योग ही मनुष्यों के आत्यन्तिक कल्याण का मुख्य साधन है, जहाँ दुःख और सुख की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है | यही योग मैंने नारदादि ऋषिओं को सुनाया था | वही मैं आपको सुनाता हूँ |
कपिल कहते हैं- माता शांति एवं आनन्द जड़ पदार्थों में नहीं है, वह तो चैतन्य आत्मा में है | मनुष्य इसकी तलाश शरीरसहित अन्य जड़ पदार्थोमें करता है, पर वह वहाँ है ही नहीं तो मिलनेका प्रश्न ही नहीं उठता | यदि शरीर में आनन्द होता तो उसमें से प्राणों के निकल जाने के बाद भी आनन्द वहाँ रहता, पर वह मृत शरीर तो कुछ घंटो के बाद भी दुर्गन्ध देने लगता है | अतः स्पष्ट है कि शरीर में जो आनन्द की अनुभूति होती थी, वह आत्मा के कारण ही थी | आनन्द का स्त्रोत तो आत्मा ही है | इस आत्मा में परमात्मा का निवास है | आत्मा-परमात्माको जान लेना ही अध्यात्म है और इस ज्ञान से ही व्यक्ति सुख-दुःखके द्वंद्वसे मुक्त हो सकता है | भगवान कपिल कहते हैं-माता जीवके बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है | विषयोंमें आसक्त होने पर वह बंधन का कारण बनता है और परमात्मा में अनुरक्त होने पर मोक्षप्रदायक हो जाता है-
चेतः खल्वस्य बंधाय मुक्तये चात्मनो मतम् |
गुणेषु सक्तं बंधाय रतं वा पुंसि मुक्तये ||
माता इस संसार से मुक्त होने के दो ही मार्ग हैं-(१) ज्ञानमार्ग (२) भक्तिमार्ग |
भगवान कपिलने ज्ञानमार्ग का जो उपदेश किया है, वह सांख्यशास्त्र है | इसके अनुसार जीवके शरीरसहित संसार के सभी पदार्थों का अस्तित्व एक चैतन्य शक्ति के कारण है | यह चैतन्य शक्ति आत्मा या दिव्य ऊर्जा है | इसके रहते ही जीव या पदार्थ का अस्तित्व रहता है और इसके निकलते ही वह जड़ हो जाता है | अध्यात्म के द्वारा आत्मा को जानकर उसकी अनुभूति की जा सकती है | जो साधक ऐसा कर लेते हैं, वे शाश्वत शांति एवं आनन्द का अनुभव कर मोक्ष-प्राप्ति के आधिकारी हो जाते हैं |
दूसरा मार्ग भक्ति का है | परमात्मा के स्वरूप का चिंतन करना, अपना कर्तव्य करते हुए प्रभु की आराधना करना | पाप-कर्मों से दूर रहकर सदा जगत के प्राणियों के कल्याण में रत रहना | परमात्माका ही स्मरण, वंदन, चिंतन,मनन करते रहना यही भक्ति है | सच्चा भक्त वह है, जो अपने परमात्मा से विभक्त नहीं है, सदा जुड़ा हुआ है उससे | एक पल के लिए भी प्रभु से अलग नहीं होता | भक्ति की ओर मनुष्य का झुकाव सत्संग से होता है | भक्ति मुक्तिदायिनी है | कपिल भगवान कहते हैं कि जो सांसारिक पदार्थों की आसक्ति को छोड़कर अनन्य भाव से मेरा ही भजन करते हैं, उन्हें मैं मृत्युरूप संसार-सागर से पार कर देता हूँ-
‘भजन्त्यनन्याय भक्त्या तान्मृत्योरतिपारये ||’
(श्रीमद्भा० ३/२५/४०)
कपिल भगवान भक्ति के सच्चे स्वरूप की विवेचना प्रस्तुत करते हैं कि केवल मेरी पूजा, अर्चना, ध्यान, आराधना करना मात्र ही भक्ति नहीं है | यदि व्यक्ति जीवों से, मनुष्यों से घृणा करता है, उनसे द्वेष भाव रखता है, उन्हें सताता है, पीड़ित-प्रताड़ित करता है तो ऐसी पूजा केवल दिखावा है |
कपिल भगवान ने तृतीये स्कंध के उन्तीसवें अध्याय के श्लोक २१ से लेकर २६ वें श्लोक तक जो उपदेश दिए हैं, वे भागवत धर्म के सार्व भौम स्वरूप को रेखांकित करते हैं |
अहं सर्वेषु भूतेषु भुतात्मावस्थित: सदा |
तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरूतेअर्चाविडम्बनम् ||
(श्रीमद्भा०३/२९/२१)
मैं आत्मा रूप से सदा सभी जीवों में स्थित रहता हूँ, इसलिए जो लोग मुझे सर्वभूतस्थित परमात्मा का अनादर करके केवल प्रतिमा में ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वांग मात्र है |
परमात्मा प्रत्येक जीवमें विद्यमान है | अतः यदि मनुष्य जीवों के प्रति, मनुष्यों के प्रति प्रेमभाव, आदरभाव नहीं रखता है, उन्हें समुचित सम्मान नहीं देता है और उनका अनादर करता है तो वह मुझे परमात्माका ही अनादर कर रहा होता है नर-रूप नारायण का तिरस्कार करके यदि कोई मेरी पूजा करता है तो वह पूजा पूजा नहीं, अपितु स्वांग है |
देवहूति को उपदेश करते हुए भगवान कहते हैं कि माताजी जो दुसरे जीवों का अपमान करता है, उनसे वैर करता है, वह तो मेरे से ही वैर कर रहा है ऐसा व्यक्ति कितनी ही उत्तम सामग्रीसे, विधि-विधान से भी मेरी मुर्तिका पूजन करे तो भी मैं उससे प्रसन्न नहीं हो सकता | जो व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के बीच थोड़ा भी अंतर करता है, उस भेददर्शी को मैं मृत्यु रूप से महान भय उपस्थित करता हूँ |
कपिल भगवान माता देवहूति के माध्यम से हम सबको, सारे संसार के मनुष्यों को दिव्य सन्देश दे रहे हैं कि हर प्राणी में मुझे देखो | सब जीवों में मैं ही बैठा हुआ हूँ | अतः हर जीव, हर व्यक्ति को मान-सम्मान दो, उसकी यथायोग्य सेवा-शुश्रूषा करो | सारे संसार को मेरा ही स्वरूप समझकर समदृष्टि से सबसे प्यार करो | यही मेरी सबसे बड़ी भक्ति है | सभी के ह्रदय में साक्षात् भगवान ही बैठे हैं | इसलिए मनुष्य को चाहिये कि समस्त प्राणियों को बड़े आदर के साथ मनसे प्रणाम करे |
इस स्कंध के तीसवें अध्याय में भगवान कपिल देह-गेह में आसक्त पुरुषों की अधोगति का वर्णन करते हैं | वे कहते हैं कि जीव संसार में जिस भी योनि में जन्म लेता है, उसीमें ऐसा रम जाता है कि उसे छोड़ना ही नहीं चाहता | अपनी उसी योनी के घर एवं संतति में आसक्त हो जाता है और अपने स्वरूप को भूल जाता है |
मनुष्य अपने परिवार के भरण-पोषण में ही दिन-रात लगा रहता है | पूरे जीवन भर वह येन-केन-प्रकारेण परिवार के लिए ही साधन जुटाता रहता रहता है | जीवन की महत्ता एवं उद्देश्य पर तो कभी वह चिंतन ही नहीं करता | गृहस्थी में पचते-पचते उसके जीवन का स्वर्णिम काल निकल जाता है और एक दिन बुढ़ापा आकर उसके देह-द्वारपर खड़ा हो जाता है उसका शरीर जर्जर हो जाता है, इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, हाथ-पैर चलते नहीं, कानों से सुनायी नहीं पड़ता, आँखों से दिखायी नहीं देता | सोने-सी आभावाली कान्तियुक्त काया कांतिहीन हो जाती है | बुढ़ा घर के एक कोने में पड़ा रहता है | जिस पत्नी एवं जिन पुत्रों के लिए इतना सब कुछ किया, वे ही उसकी उपेक्षा करने लगते हैं | दीन-हीन होकर असहाय-सा वह पड़ा रहता है | मृत्यु के समय भयंकर वेदना जीव को झेलनी पड़ती है | यमदूत जीव को यमपुर ले जाते हैं तो मार्ग में तरह-तरह की यातनाएँ देते है | अपने शरीर और कुटुंब को छोड़कर जीव अकेला ही यहाँ से जाता ही और अपने किये हुए पापों का फल भोगता है | व्यक्ति के साथ केवल उसके शुभ-अशुभ कर्म ही जाते हैं, उसके द्वारा अर्जित भौतिक सम्पदा यहीं छुट जाती है | मनुष्य अपने कुटुंब के पालने में, उनके लिए सुख-सुविधा, ऐशो-आराम के साधन जुटाने में जो अन्याय करता है, पाप करता है, उनका कुफल वह अकेले ही नरक में जाकर भोगता है | कपिल भगवान कहते हैं- माता जो पुरुष निरी पापकी कमाई से ही अपने परिवार का पालन करने में व्यस्त रहता है, वह अन्धतामिस्त्र नरक में जाता है, जो नरकों में चरमसीमा का कष्टप्रद स्थान है |
इस स्कंध के इकतीसवें अध्याय में मनुष्य-योनीको प्राप्त हुए जीव की गति का वर्णन है | कपिल भगवान कहते हैं- माता पुर्वक्रमानुसार जब जीव मनुष्य-योनी में जन्म लेता है तो प्रभु-प्रेरणा से वह पुरुष के वीर्यकणद्वारा स्त्री के गर्भ में प्रवेश करता है | वहाँ एक रात्रि में स्त्री के रज में मिलकर एक-रूप कलल बन जाता है | पाँच रात में बुदबुद रूप हो जाता है, दस दिन में बेर के समान कुछ कठोर हो जाता है | उसके बाद अंडे के रूप में परिणित हो जाता है | एक महीने में उसके सिर निकल आता है | दो मास में हाथ-पाँव आदि अंग निर्मित हो जाते हैं और तीन मास में नख, रोम, अस्थि, चर्म, लिंगके चिह्न तथा अन्य छिद्र उत्पन्न हो जाते हैं | चार मास में उसमें मांसादि सातों धातुएं पैदा हो जाती हैं, पाँचवें महीने में भूख-प्यास लगने लगती है और छठे मास में झिल्ली से लिपटकर दाहिनी कोख में घुमने लगता है | उस समय माताकेद्वारा खाये हुए अन्न-जल से उसकी सब धातुएं पुष्ट होने लगती हैं और वह कृमीआदि जंतुओंके उत्पत्ति-स्थान उस मलमूत्र के गड्ढेमें पड़ा रहता है | वहाँ के भूखे कीड़े उसके अंग-प्रत्यंग नोचते हैं | अतः अत्यंत कष्ट के कारण वह क्षण-क्षण में अचेत हो जाता है | माता के खाये हुए कड़वे, तीखे, गरम, नमकीन, रूखे और खट्टे आदि उग्र पदार्थों का स्पर्श होने से उसके सारे शरीर में पीड़ा होने लगती है | इसी समय अदृष्टकी प्रेरणासे उसे स्मरण-शक्ति प्राप्त होती है, तब उसे अपने सैकड़ों पूर्व-जन्मोंके कर्म याद आते हैं | गर्भ में पड़ा जीव भगवान से प्रार्थना करता है कि प्रभो मुझे बाहर निकालो | मैं बड़ा अधम हूँ | संसार में आनेके बाद मैं गर्भवास के कष्ट भूल गया, आपको भी भूल गया और संसार की मोह-माया में ऐसा लिप्त हो गया कि जन्म-मरणके चक्र से मुक्त होनेके लिए मैंने कोई प्रयास ही नहीं किया | मनुष्य-जीवन की महत्ता को ही नहीं समझा | यह भूल गया कि यह मनुष्य-शरीर तो मुक्ति के लिए ही मिला है और परिणाम यह हुआ कि फिरसे चौरासी के चक्कर में भटकना पड़ा | अब यह भूल मुझसे नहीं होगी | अबकी बार कृपा करके क्षमा कर दो | किंतु गर्भ से बाहर आते ही जीव का यह ज्ञान विस्मृत हो जाता है | हमारे धर्मशास्त्, संत-महात्मा इस विस्मृत ज्ञान को जीवनभर हमें सुनाते रहते हैं, किंतु फिर भी मनुष्य नहीं चेतता है | यह बहुत बड़ी विडम्बनाहै | पर इसके पीछे उद्देश्य यह है कि जीव संसार में आकर पुनः आसक्त न हो जाय | उसे गर्भवास के कष्टों की स्मृति दिलायी जाय जिससे कि वह भक्ति, ज्ञान एवं सत्कर्मों के द्वारा संसृति से छुटकारा प्राप्तिहेतु साधना कर सके |
अंतमें कपिलजी बोले माताजी मैंने तुम्हें यह जो सुगम मार्ग बताया है, इसका अवलम्बन करने से तुम शीघ्र ही परमपद प्राप्त कर लोगी | इस प्रकार श्रेष्ट आत्मज्ञानका उपदेश देकर श्रीकपिलदेवजी वहाँ से चले गये | तब देवहूति जी सरस्वती के किनारे अपने आश्रम में साधना में लीन हो गयीं और थोड़े ही समय में उन्होंने श्रीभगवान को प्राप्त क्र लिया |
कपिल भगवान संगम तीर्थ पर आये, समुंद्रने कपिल भगवान का स्वागत किया | गंगासागर के तीरपर कपिल-मुनि का आश्रम है | गंगासागर में स्नान करने बाद भक्तजन कपिल भगवानके दर्शनकर पूजा-अर्चना करते हैं |
उनके आश्रम में पहुँचनेपर दर्शन करनेसे भक्तको आत्मज्ञानकी प्राप्ति होती है, जिससे व्यक्ति संसृति से छुटकारापा सकता है, मुक्तिपा सकता है | यही मनुष्य-जीवनका सबसे बड़ा लाभ है |
गंगासागर पर कपिलमुनिका आश्रम होने से यह संकेत मिलता है कि जिस प्रकार गंगाजी समुद्र में जा मिलकर विश्रांति पा जाती हैं | इसी प्रकार मनुष्य भी आत्मज्ञानके द्वारा अपने जन्म-मरणके गमनागमसे मुक्त हो शांति प्राप्त कर लेता है |