परीक्षितजीके दो प्रश्न
प्रथम स्कंध के अंत में परीक्षित ने शुकदेव जी से दो मत्वपूर्ण प्रश्न किये थे | उन्होंने पूछा था कि जो लोग पुरुष सर्वथा मरणासन्न है, उसको क्या करना चाहिए और मनुष्यमात्र को अपने जीवन में क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए | इन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर देना शुकदेव जी द्वितीये स्कंध में प्रारम्भ करते हैं | वास्तव में जीवन के ये मौलिक प्रश्न हैं और हर जागरूक मनुष्य को ये प्रश्न स्वयं से भी पूछने चाहिये | इन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर में जीवन का रहस्य छिपा हुआ है | संसार में आकर मनुष्य का कर्तव्य क्या है, उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ? और यदि उसने पूरा जीवन इस प्रश्न पर चिंतन किये बिना ही बिता दिया और मृत्यु का समय आ पहुँचा है, बहुत ही कम दिन शेष रहे हैं जीवन के और तब चेतना जागी है तो ऐसी स्थिति में उसे क्या करना उचित होगा-यह प्रश्न भी बहुत महत्वपूर्ण है | भागवत इन दो प्रश्नों का उत्तर बड़े सुन्दर ढंग से देता है और मनुष्य का सही मार्ग दर्शन करता है | इसलिए भागवतशास्त्र एक अनुपम शास्त्र है | सही अर्थोमें यह जीवन का मार्गदर्शक है | इसलिये हर मनुष्य को भागवत का स्वाध्याय करना चाहिये |
शुकदेव जी कहते हैं कि परीक्षित ! लोकहित के लिए किया गया तुम्हारा यह प्रश्न बहुत उत्तम है | मानव-जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है यह | संसार में आकर मनुष्य माया के जाल में ऐसा फंस गया है, दुनियादारी में ऐसा उलझ गया है कि वह अपने मूल घर ( परमात्मा के निवास )- को ही भूल गया है | जीव भटक गया है संसार में | मनुष्य की सारी उम्र यों ही बीत जाती है | शुकदेवजी कहते हैं-
निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः |
दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभर्णेन वा ||
(श्रीमद्भा० २/१/३)
अर्थात उनकी रात नीद या स्त्री-संगसे कटती है और दिन धन की हाय-हाय या कुटुम्बियों के भरण-पोषण में समाप्त हो जाता है | संसार में जिन्हें अपना घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, वे सब असत हैं, परंतु जीव उनके मोह में ऐसा पागल हो जाता है कि दिन-रात उनको मृत्यु का ग्रास होते देखकर भी चेतता नहीं | विवेक का दंभ भरने वाला मनुष्य इतना मूढ हो गया है कि वह जीविका को ही जीवन समझ बैठा है | उसने न तो कभी जीवन पर विचार किया है और न ही जीवन के असली लक्ष्य को समझने की कोशिश की है | इस संसार में व्यक्ति खाने, कमाने, परिवार बसाने, उसे पालने, गृहस्थ-सुख भोगने, काम-तृप्ति एवं भोग-विलास के लिये ही नहीं आया है इसके अतिरिक्त भी जीवन का कोई मुख्य उद्देश्य है, किंतु यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि मनुष्य उस ओर तो कोई ध्यान ही नहीं देता | भागवत-महापुराण में श्रीशुकदेवजी परीक्षित के माध्यम से इसी मूल उद्देश्य, असली लक्ष्य की ओर हम सबका ध्यान आकर्षित कर रहे हैं |
जीवन सीमित है और यह प्रतिक्षण, प्रतिपल मृत्यु की अमानत है, वह कभी भी इसे वापस ले सकती है | किंतु मनुष्य है कि वह मृत्यु की ओर से पूरी तरह आश्वस्त है | सोचता है कि लोग मर रहे हैं, पर मुझें नहीं मरना है | यह संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है |
भागवत कहता है कि मृत्यु को सदा याद रखो | दुनिया में रहकर पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाओ, पर यह कभी नहीं भूलो कि हमें सदा यहाँ नहीं रहना है, एक दिन सब छोड़कर यहाँ से जाना है | रोज़ सबेरे उठकर यही सोचो कि आज मेरे जीवन का आखिरी दिन है | परमात्मा का बुलावा किसी भी क्षण आ सकता है | मनुष्य-जीवन की अंतिम परीक्षा मृत्यु है | अतः मृत्यु की तैयारी करो | जीवन के लिए तो बहुत साधन जुटाये गये, पर कभी ख्याल किया कि मृत्यु के लिये क्या तैयारी की है ? छोटी-छोटी लौकिक यात्राओं के लिये तो महीनोंसे तैयारी करते हो, पर पारलौकिक यात्रा, अंतिम यात्रा की क्या तैयारी की है ? सोचा कभी ? वह यात्रा सुखद हो, शांतिपूर्ण हो, इसके लिये क्या जुटाया ?
भागवत बताता है कि जीवन शांति से बीते और मृत्यु मंगलमय हो, इसके लिये काल को ध्यान में रख हमेशा ईश्वर का चिंतन करो | जो व्यक्ति जीवन में सदैव मृत्यु को याद करते रहते हैं, वे पापकर्म से दूर रहते हैं |
गीता में भगवान ने कहा है कि अन्तकाल में जो मुझे स्मरण करता हुआ शरीर-त्याग करता है, वह मेरे धाम को आता है, मुझे प्राप्त करता है-
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम |
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: ||
(८/५)
शुकदेव जी कहते हैं कि परीक्षित ! मनुष्य को हमेशा भगवत-चिंतन करते रहना चाहिए, क्योंकि अन्तकाल में वही याद आता है, जो जीवनभर किया है | आगे परीक्षित शुकदेव जी से पूछते हैं कि परमात्मा में मन कैसे लगाया जाय ? ध्यान कैसे किया जाय ? भजन में मन कैसे लगे ? प्रभु का चिंतन कैसे हो ? शुकदेवजी ने विस्तारसे ध्यान विधि बतायी एवं भगवच्चरणोंमें प्रेम प्रेम कैसे हो, इसका मार्ग बताया और कहा-ध्यान के लिए भगवान के स्वरुप का चिंतन करो | मन विराट पुरुष पर केन्द्रित करो | संसार से मन परब्रह्म परमात्मा के चिंतन में लीन हो जायगा और प्रभु ओर यात्रा प्रारम्भ हो जायेगी |
शुकदेव जी ने सृष्टिकी उत्पत्ति एवं विराट पुरुष के प्रादुर्भाव का भी वर्णन किया | ब्रह्माजीने भगवानके आदेशानुसार सृष्टि-निर्माणका प्रयास किया, पर बिना तपके उनसे यह संभव नहीं हो सका | फिर ब्रह्माजीने कठोर तपस्या की, तब कहीं वे सृष्टि-सृजन की क्षमता प्राप्त कर सके | संकेत यह है कि किसी भी प्रकारका सृजन कोई सामान्य कार्य नहीं है, सृजनके लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती है | श्रम एवं साधना करनी पड़ती है | एक अच्छी रचना के सृजन के लिये रचनाकारको कई-कई रात घंटो बैठकर चिंतन-मनन, श्रम, साधना करनी होती है, तब कहीं वह आकार ले पाती है |
चतुश्श्लोकी भागवत
द्वतीय स्कंध के नवें अध्यायमें भगवानने ब्रह्माजीको चतुश्श्लोकी भागवतका उपदेश दिया | नवें अध्यायका ३२वाँ से ३५वां श्लोक चतुश्श्लोकी भागवत है | इस चतुश्श्लोकी भागवतमें भगवानने अपने एवं अपने जगतके रहस्यको समझाया है | इसमें सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान आ गया है | इसको समझ लेनेके बाद फिर और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता |
भगवान ब्रह्माजीसे कहते हैं-
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद यत सदसत परम |
पश्चादहं यदेतच्च योवशिष्येत सोस्म्यहम ||
(श्रीमद० २/९/३२)
अर्थात सृष्टिके पूर्व केवल मैं-ही-मैं था | मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं था | जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ भी मैं-ही-मैं हूँ | इस सृष्टिके रूपमें जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं हूँ और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ | तात्पर्य यह है कि इस सृष्टिमें सर्वत्र परमात्मा-ही-परमात्मा है, परमात्माके आलावा कुछ भी नहीं है | इशावास्योपनिषदमें भी यही कहा गया है-
‘ईशा वस्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्|’
श्लोक ३३, ३४ एवं ३५ का सार-संक्षेप यह है कि अस्तित्व न होनेपर भी जो वस्तु वास्तविक प्रतीत हो रही है और मेरे विद्यमान होनेपर भी जो मेरी प्रतीति नहीं होती, वह मेरी मायाके कारण है | सभी प्राणियोंके शरीरमें आत्मारूपमें मैं प्रवेश किये हुए हूँ और चूँकि मेरे अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, इसलिए प्रवेश नहीं भी किये हूँ | इसे इस प्रकार समझें कि एक बड़े वृतमें बहुतसे छोटे वृत्त हैं, तो यह कथन सत्य है कि बड़ा वृत्त छोटे वृत्तोमें प्रविष्ट है भी और प्रविष्ट नहीं भी है, क्योंकि छोटा वृत्त तो बड़े वृत्तका ही भाग है | बड़ा वृत्त तो वहाँ पहलेसे ही मौजूद है | ठीक ऐसे ही संसारकी हर वस्तुमें, कण-कणमें, रज-रजमें प्रभु विद्यमान हैं भी और विद्यमान नहीं भी हैं, क्योंकि वह तो पूर्वसे ही सर्वव्याप्त है, सारा क्षेत्र ही उनका है | परीक्षित ज्ञानसे, विज्ञानंसे, तर्कसे, चिंतनसे, मननसे यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरुप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं | जो आत्मतत्त्व एवं परमात्मतत्त्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जाननेकी आवश्यकता है |
इन चारों श्लोकोंमें जीव, जगत एवं जगदीश्वरके सारे गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं | इन्हें समझनेके लिये उच्च कोटिका चिंतन, मनन तो चाहिए ही, साथमें परमात्माकी कृपा भी चाहिये तभी इनका वास्तविक अर्थ-असली रहस्य समझ में आ सकेगा | इसको सही रूपमें जाननेके बाद जीव और जगदीश्वर एक हो जायेंगे | ‘श्रीरामचरितमानस’ में भी गोस्वामी तुलसीदासजीने यही कहा है-
‘सोई जानइ जेहि देहु जनाई | जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ||
(रा०च०मा० २/१२७/३)
अंतमें भगवान ब्रह्माजीसे कहते हैं कि ब्रह्माजी तुम अविचल समाधिके द्वारा इस सिद्धांतमें पूर्ण निष्ठा कर लो, इससे तुम्हें कल्प-कल्पमें विविध प्रकारकी सृष्टि-रचना करते रहनेपर भी मोह नहीं होगा | यह कहकर भगवान अन्तर्धान हो गये | भगवानका संकेत यहाँ यह है कि व्यक्ति जीवनमें जो कर्म करता है, जो उपलब्धियाँ प्राप्त करता है, उन्हें वह स्व-अर्जित समझ लेता है, उनमें ही वह रम जाता है, कर्तव्यका अहंकार उसमें आ जाता है | किंतु व्यक्ति यदि यह समझेगा कि सारी सृष्टि भगवानकी है तो वह स्वयं भी भगवानका हुआ तो जो कुछ वह कर रहा है वह भी भागवत-प्रेरणासे कर रहा है, उसीकी शक्तिसे कर रहा है | अतएव उसमें उसका अपना कुछ नहीं है, सब उसी परमात्माका है, तो व्यक्ति दुःख, क्लेश, मोह, ममतासे मुक्त रहेगा | ऐसी स्थितिमें मनुष्यको मोक्षके लिये अलगसे प्रयत्न नहीं करना पड़ेगा, फिर तो वह मुक्त ही है |
भागवतके दस लक्षण
इस स्कंध के दसवें अध्याय में श्रीशुकदेवजीने भागवतके दस लक्षणोंका उल्लेख किया है | ये लक्षण हैं- सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय | पूरे भागवतमें इन्हीं दस विषयोंका वर्णन है |
ईश्वरकी प्रेरणासे जो आकाशादि पंचभूत, शब्दादि तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, अहंकार और महत्तत्वकी उत्पत्ति होती है, उसको ‘सर्ग’ कहते हैं | ब्रह्माजीके द्वारा जो विभिन्न चराचर सृष्टियोंका निर्माण होता है उसका नाम ‘विसर्ग’ है | विनाशकी ओर बढ़नेवाली इस सृष्टिको मर्यादामें स्थिर रखनेसे भगवान विष्णु की जो श्रेष्ठता सिद्ध होती है, उसका नाम ‘स्थान’ है | भगवानकी भक्तोंके ऊपर जो कृपा होती है, उसका नाम ‘पोषण’ है | जीवोंकी वासनाएँ ‘ऊति’ नामसे जानी जाती हैं | मन्वन्तरोंके अधिपतिको ‘मन्वन्तर’ कहते हैं | भगवान के विभिन्न अवतारों एवं उनके प्रेमी भक्तोंकी विविध आख्यानोंसे युक्त गाथाएँ ‘ईशानुकथा’ हैं | कल्पान्तके समय जीवका परमात्मा में लीन हो जाना ‘निरोध’ है | कर्तव्य, भोक्त्रत्व आदिका परित्याग करके जीवका अपने वास्तविक स्वरुप परमात्मामें स्थित हो जाना ‘मुक्ति’ है | इस चराचर जगत की उत्पत्ति और प्रलय जिस तत्व से प्रकाशित होते हैं, वह परब्रह्म ही ‘आश्रय’ है, शास्त्रोंमें उसीको परमात्मा कहा गया है-
आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते |
स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ||
इस भागवत-महापुराणमे ‘सर्ग’ से लेकर ‘आश्रय’ तकके विविध सोपानोका वर्णन है | जीव अपने आश्रय परमात्मा की ओर यात्रा प्रारम्भ करके कैसे वहाँ तक पहुँच सकता है, इन बिन्दुओंकी चर्चा भागवतमें है | अतः भागवत एक मोक्षशास्त्र है |
आगे शुकदेवजी कहते हैं कि परिक्षित भगवानने ब्रह्माजी से कहा कि संसारमे मनुष्यसहित जो भी जीव हैं, वे सब मेरे ही बनाये हुए हैं | सभी जीवोंमें मैं ही बैठा हुआ हूँ | चर-अचर सम्पूर्ण जगतमें मैं-ही-मैं व्याप्त हूँ | मेरे अतिरिक्त इस जगतमें कुछ है ही नहीं |
भागवतके इस दिव्य सन्देशको यदि हर व्यक्ति समझ ले और आत्मसातकर चिंतन एवं आचरणमें उतार ले तो फिर मनुष्य-मनुष्यके बीच जो परस्पर विवाद है, वह सब दूर हो जाय और पूरे संसारमें प्रेम, सद्भाव, शांतिका वातावरण निर्मित हो जाय |
जिस प्रकार ‘श्रीमदभगवदगीता’ का सार गीताके दुसरे अध्यायमें ही आ गया है, उसी प्रकार ‘भागवत’ का पूरा सार इस द्वितीय स्कंधमें आ गया है | इस स्कंधमें मुख्यरूपसे भगवानके विराट-स्वरुपका वर्णन, क्रम-मुक्ति और सद्योमुक्ति, देवोपासना तथा भगवद्भक्तिका महात्म्य, सृष्टिवर्णन, विराटस्वरुपकी विभूतियोंका वर्णन, ब्रह्माजीद्वारा भगवद्धामदर्शन, चतु:श्लोकी भागवतका उपदेश, भागवतके दस लक्षण तथा आश्रयतत्वकी-भाग्वात्तत्त्वकी व्याख्या वर्णित है |