भागवतकथोपरान्त श्रीमद्भागवतमाहात्म्य

कीर्तनोत्सव में उद्धव जी का प्रकट होना, श्रीमद्भागवत में विशुद्ध भक्ति,भगवान श्रीकृष्ण के नाम लीला गुण आदि का संकीर्तन किया जाये तो वे स्वयं ही हृदय में आ विराजते हैं और श्रवण,कीर्तन करने वाले के सारे दु:ख मिटा देते हैं , ठीक वैसे ही जैसे सूर्ये अन्धकार को और आँधी बादलों को तितर-बितर कर देते हैं। जिस वाणी से घट-घटवासी अविनाशी भगवान के नाम लीला, गुण,का उच्चारण नहीं होता, वह वाणी भावपूर्ण होने पर भी निरर्थक है, सारहीन है. जिस वाणी से चाहे वह रस, भाव, अंलकार आदि से युक्त ही क्यों न हो – जगत् को पवित्र करने वाले भगवान श्रीकृष्ण के यश का कभी गान नहीं होता. वह तो अत्यंत अपवित्र है इसके विपरीत जिसमे सुन्दर रचना भी नहीं है, और जो व्याकरण आदि की द्रृष्टि से दूषित शब्दों से युक्त भी है, परन्तु जिसके प्रत्येक श्लोक में भगवान के सुयश नाम जड़े है वही वाणी लोगो के सारे पापों का नाश कर देती है l

गलतियों के लिये – मुझे क्षमा करें

                                                      श्रीमद्भागवत महापुराण कथा
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