भागवत का ‘हृदय’ दशम स्कन्ध है बड़े-बड़े संत महात्मा, भक्त के प्राण है ये दशम स्कन्ध. भगवान अजन्मा है, उनका न जन्म होता है न मृत्यु, श्रीकृष्ण का तो केवल ‘प्राकट्य’ होता है, भगवान का प्राकट्य किसके जीवन में, और क्यों होता है, किस तरह के भक्त भगवान को प्रिय है, भक्तों पर कृपा करने के लिए, कारगार में जन्म – उन्हें कोई बन्धन नहीं , नील कमल का जन्म कंस के कीचड़ में भले हो पर खिलता व्रज के सरोवर गोकुल में ,
‘पूजा-पद्धति’ स्वीकार करने के लिए , चाहे जैसी भी पद्धति हो, के लिए ही भगवान का प्राकट्य हुआ, उनकी सारी लीलायें, केवल अपने भक्तों के लिए थी, जिस-जिस भक्त ने उद्धार चाहा, वह राक्षस बनकर उनके सामने आता गया और जिसने उनके साथ क्रीडा चाही वह भक्त, सखा, गोपी, के माध्यम से सामने आते गए, उद्देश्य केवल एक था – ‘श्रीकृष्ण की प्राप्ति ’ भगवान की इन्ही ‘दिव्य लीलाओं का वर्णन’ इस स्कन्ध में है. जहाँ ‘पूतना-मोक्ष’,‘उखल बंधन’ ‘चीर-हरण’, ‘गोवर्धन’ जैसी दिव्य-लीला , कंसवधा उन्हीं की लीला के माध्यम से पाँचों तत्व शुद्ध किये हैं -तृणाव्रतवध से वायु तत्व, नागलीला- से जल तत्व , व्योमासुर वध आकाश तत्व , दावाग्निपान से अग्नि तत्व भौमासुर वध से पृथिवी तत्व ,
और ‘रास’,तो ‘महारास’, ‘गोपीगीत’ तो दिव्यातिदिव्य लीलायें है। इन दिव्य लीलाओं का श्रवण, चिंतन, मनन, बस यही ‘जीवन का सार’ है l