सप्तम स्कन्ध में शिशुपाल और दन्तवक्त्र के पूर्व जन्म, राजासुयज्ञ की कथा , नृसिंह अवतार ‘प्रहलाद-चरित्र’ के माध्यम से बताया गया है कि हजारों मुसीबत आने पर भी भगवान का नाम न छूटे, यदि भगवान का बैरी पिता ही क्यों न हो उसे भी छोड़ देना चाहिये । मानव-धर्म, वर्ण-धर्म, स्त्री-धर्म,ब्रह्मचर्य गृहस्थ और वानप्रस्थ-आश्रमों के नियम का कैसे पालन करना चाहिये इसका निरुपण है । कर्म व्यक्ति कों कैसे करना चाहिये , स्त्रीधर्म यही इस स्कन्ध का सार है.