गाँधी जी का शरीर बहुत दुर्बल था। वे मात्र १६ पौंड के थे। शारीरिक दृष्टि से उनकी सामर्थ्य उपहासास्पद ही गिनी जायगी। उन्हें तो कोई किशोर भी दौड़ने या लड़ने की चुनौती दे सकता था, पर उनकी शक्ति का मूल्याकंन जिनने किया है वे जानते हैं कि पर्वत से ऊँचा और समुद्र से विस्तृत उनका व्यक्तित्व था। उनकी प्रचण्ड सामर्थ्य की टक्कर अँग्रेज सरकार से हुई और इस कुश्ती में वे ही जीते। इतनी बडी़ कुश्ती तो बडे़ से बडा़ पहलवान भी नहीं लड़ सकता था। साधन बल से भी यह युद्ध जीतना कठिन था। आत्म- बल ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में जो भूमिका निबाही उसे देखते हुए स्पष्ट है कि संसार की सबसे बडी़ सामर्थ्य यही है। आत्म- बल से बढ़कर और कोई बल इस संसार में है ही नहीं।
व्यक्तिगत जीवन की गरिमा उस आत्म- बल पर आधारित है जिसमें आदर्श और संकल्प का समान रूप से समन्वय होता है। सदुद्देश्य में भाव- भरी श्रद्धा और कर्त्तव्य पालन में प्रचण्ड निष्ठा का समन्वय होने से इस आत्म- शक्ति का उदय होता है। उसी के सहारे लोभ और भय के अवरोधों को हटाते हुए उच्चस्तरीय आदर्शों को पूरा कर सकना सम्भव होता है। समाज सेवा की परमार्थ परायणता से ही कोई व्यक्ति यशस्वी होता है। लोक- सम्मान और जन सहयोग पाकर लोग ऊँचे उठते और सफल बनते हैं। यशस्वी और जन- नायक बनने की आकांक्षा भी बिना आत्म- बल के पूर्ण नहीं हो सकती। परमार्थ प्रवृत्ति गहरी और उच्चस्तरीय होनी चाहिए। तभी उसका चिरस्थायी सत्परिणाम निकलेगा। हथकण्डे बाजी से कुछ समय के लिए सस्ती वाहवाही की लुटखसोट हो सकती है, पर उतने भर से कोई काम बन नहीं सकता। धूर्तता के बल पर समेटी गई प्रशंसा में स्थायित्व कहाँ होता है? काठ की हाँडी में खिचडी़ में खिचडी़ कहाँ पक पाती है?
अपने अनुकरणीय आदर्श छोड़ जाने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य कर गुजरने वाले व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया जाय तो उनमें सभी में संकल्प- बल की विशेषता पाई जायगी। कहना न होगा कि ओछे, दुष्ट, स्वार्थी मन भूमि में वह संकल्प- शक्ति विकसित हो ही नहीं सकती जिसकी गर्मी से पर्वत गलने और पानी की तरह बहने लगते हैं।
आतंकवादी दुष्ट, दुरात्मा भी बलिष्ठता का ड़का बजाते और ढिंढोरा पीटते देखे गये हैं। उद्दण्डता से डर कर कई दुर्बल प्रकृति के व्यक्ति डरते, घबराते और उनका लोहा मानते भी देखे गये हैं। इस दुष्ट और दुर्बल संयोग से उत्पन्न अवांछनीय प्रतिक्रिया को प्रायः उद्दण्डता की शक्ति के रूप में माना समझा जाने समझा जाने लगा है। वह दुःखद और अवास्तविक मान्यता है। अनैतिक आतंक में यदि कुछ सामर्थ्य है भी तो वह यत्किंचित विनाश कर सकने भर की है। सृजन का कोई तत्व उसमें रत्ती भर भी नहीं है। उपलब्धियाँ तो सृजन की होती हैं। लाभ तो उन्हीं का मिलता है। व्यक्तित्व और कर्तृत्वतो उन्हीं के सहारे निखरता है। ध्वंस को शस्त्र बनाकर चलने वाले वैसा कुछ पा नहीं सकते। वे दूसरों को हानि पहुँचा सकते हैं। प्रथम आक्रमण करने वाला सदा लाभ में रहता है। पर वह लाभ न स्थायी और न फलदायक। अन्ततः वह आक्रमणकारी के लिए ही अभिशाप सिद्ध होता है। माचिस की तीली का अस्तित्व नगण्य है, पर अग्निकाण्ड तो वही रच सकती है। लोहे की एक छोटी सी कील भी किसी का प्राण हरण कर सकती है। इस ध्वंस सामर्थ्य से आक्रमणकारी का कोई लाभ नहीं होता। तीली अग्निकाण्ड तो करती है, पर उसी आग में जलकर उसे स्वयं भी समाप्त होना पड़ता है। पागल कुत्ता कइयों को काट सकता है, पर खैर उसकी भी नहीं है। प्रकृति दण्ड अर्थात् दुष्टता के विरुद्ध उभरे आक्रोश से उसे मृत्यु मुख में ही जाना पड़ता है जब कि काटे हुए लोग दवादारू के सहारे अच्छे भी हो जाते हैं।
यहाँ चर्चा वास्तविक और अवास्तविक बलिष्ठता की हो रही थी। आतंक, अनीति और धूर्तता का प्रश्रय लेकर भी यत्किंचित बलिष्ठता उपार्जित करते हुए लोग देखे गये हैं। इसमें कइयों का मन इस सस्ती उपलब्धि के लिए मचलता है और वे दुष्टता के सहारे बलिष्ठ बनने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ यह हजार बार समझ लिया जाना चाहिए कि यह अवलम्बन न तो सरल होता है और न सफल। दुष्टता अपनाकर सम्मान भी गंवाया जाता है और सहयोग भी। घृणा, तिरस्कार का ताना- बाना अपने चारों ओर बुन डालने वाला व्यक्ति मित्र विहीन बनता चला जायगा। घिनौने व्यक्ति के दो ही साथी होते हैं एक पतन दूसरा विनाश। आतंकवादी बलिष्ठता के दुष्परिणामों को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।