वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये – १

वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये-

उपनिषद का ऋषि कहता है- “नयमात्मा बल हीने लभ्यो” यह आत्म दुर्बलों को मिल ही नहीं सकता।
विभिन्न बलों की साधना विभिन्न क्षेत्रों में अपने- अपने ढंग से की जाती है। साधना बल भी एक बल है। प्रगति और सुख- सुविधा के लिए साधनों का संचय भी प्रकारान्तर से शक्ति साधना का ही एक रूप है। पर अभाव एक ही बात का रह जाता है कि यह सब उथली ऊपरी सतह पर ही किया जाता है। उसमें क्रिया और बुद्धि का ही समन्वय रहता है। यदि इसमें उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं का भी समावेश रहा होता तो निश्चित रूप से यही प्रयत्न आकाश में टँगे रवि- शशि और तारक मण्डल की तरह चमचमाते- जगमगाते दृष्टिगोचर होते।
          ऊपरी सतह पर जो हलचलें होती हैं वे अपने प्रयास साधनों के अनुरूप स्वल्प परिणाम ही उत्पन्न करती हैं। मोटर का इन्जन खराब हो। पैट्रोल की टंकी खाली हो तो भी उसे धक्के लगाते हुए कुछ दूर ले जाया जाता जा सकता है। सवारियाँ उसके भीतर छाया का लाभ ले सकती है, पर उस गाडी़की द्रुतगति का लाभ तो सही इन्जन और आवश्यक पैट्रोल होने पर ही सम्भव हो सकता है। शरीर और मन के समन्वित प्रयत्नों से निर्वाह प्रक्रिया तो पूरी होती रह सकती है, पर किसी दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति करने के लिए उसमें गहन अन्तराल का, संकल्प शक्ति का, आत्म- विश्वास का, अटूट तत्परता का समावेश होना चाहिए। यह सभी उच्चस्तरीय तत्त्व शरीर और मन के क्षेत्र से ऊपर हैं, वे अन्तःकरण की गहरी परतों में ही भरे हैं। और वहीं से उभर कर ऊपर आते हैं। यदि वह मर्म स्थल प्रसुप्त स्थिति में पडा़ हो तो फिर हर पराक्रम बहुत ही उथले स्तर का रहेगा और उस प्रयास का परिणाम भी अति स्वल्प निकलेगा।
          पैनी तलवार भी युद्ध मैदान में लड़ा जाता है और सिर भी उसी से कटते हैं। इस प्रत्यक्ष तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। पर इतना ही मान बैठना नासमझी होगी। तलवार चलाने के लिए कलाई की मजबूती और मस्तिष्क की अभ्यस्त क्रिया- कुशलता आवश्यक है। इसके बिना बढि़यातलवार भी कुछ काम न कर सकेंगी और न प्रहार कर सकेंगी। इतना ही नहीं यदि चलाने की कुशलता और सूझ- बूझ अभ्यास में नहीं उतारी गई है तो भी वह शस्त्र निरर्थक ही सिद्ध होगा।
           ऊपर की पंक्तियों में तलवार रूप साधन और हाथ रूप मस्तिष्क की मजबूती से युद्ध में सफलता मिलने की बात कही गई है, पर थोडा़ विचार करने पर एक नया तथ्य और भी उभर कर आता है कि सैनिकोचित शौर्य, साहस का अभाव रहा, अन्तःकरण में भीरुता छाई रही, उत्कट देश- भक्ति का स्थान उदासीनता ने ले लिया तो अन्तराल की स्थिति खोखली रह जायगी। ऐसी दशा में वह दुर्बलता अपने आप में संकट बन जायगी और उसके रहते तलवार की अच्छाई और हाथ की मजबूती भी कारगर सिद्ध न होगी। भीतर से हड़बडा़या हुआ डरता, काँपता सैनिक युद्ध में विजयी होकर नहीं लौट सकता।
          शक्ति का स्त्रोत अन्तराल है। समर्थता और दुर्बलता का वास्तविक मूल्याकंन इसी स्तर की स्थिति को देखकर किया जा सकता है। बलवान वही है जिसकी अन्तरात्मा बलिष्ठ है। इतिहास साक्षी है कि आश्चर्यचकित कर देने वाली अति महत्त्वपूर्ण सफलताएँ न तो साधनों के सहारे मिली हैं और न बुद्धि कौशल का ही उसमें बहुत बडा़ हाथ रहा है। चमत्कार संकल्प- शक्ति ही उत्पन्न करती है और यह संकल्प बल उच्चस्तरीय आदर्शों का समन्वय हुए बिना उत्पन्न हो ही नहीं सकता। ललक- लिप्सा के वशीभूत होकर भी लोग उन्नति की दौड़- धूप करते हैं, पर वह न तो स्थिर होती है और न गहरी। अधिक लाभ, बहुत जल्दी मिलने का उत्साह जब तक रहता है तभी तक वे प्रयत्न चलते हैं जैसे ही सफलता श्रम- साध्य, समय- साध्य एवं धूमिल दिखाई दी वैसे ही हाथ- पैर फूल जाते हैं। उत्साह ठण्डा होने पर काम को छोड़ बैठने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं रह जाता। हर अवरोध से जूझते हुए, बिना थके झुके प्रयत्नरत रहने की स्थिति अन्तराल की आस्थावान् संकल्प- शक्ति के सहारे ही सम्भव होती है। महत्त्वपूर्ण कार्यों की सफलता पूर्णतया उसी आन्तरिक प्रखरता के, आत्म- बल के, ऊपर निर्भर रहती है। शक्ति का उद्गम स्त्रोत अन्तःकरण से ही उभरता है। शरीर और मस्तिष्क में तो उसका प्रवाह भर चलता दीखता है।

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