दिव्य धनुष और तरकश :

दधीचि ऋषि ने देश के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था। उनकी हड्डियों से 3 धनुष बने- 1. गांडीव, 2. पिनाक और 3. सारंग। इसके अलावा उनकी छाती की हड्डियों से इंद्र का वज्र बनाया गया। इन्द्र ने यह वज्र कर्ण को दे दिया था।
पिनाक शिव के पास था जिसे रावण ने ले लिया था। रावण से यह परशुराम के पास चला गया। परशुराम ने इसे राजा जनक को दे दिया था। राजा जनक की सभा में श्रीराम ने इसे तोड़ दिया था। सारंग विष्णु के पास था। विष्णु से यह राम के पास गया और बाद में श्रीकृष्ण के पास आ गया था। गांडीव अग्निदेव के पास था जिसे अर्जुन ने ले लिया था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक ऐसा धनुष, तीर और तरकश है जिसका कभी नाश नहीं हो सकता। यह तीर चलाने के बाद पुन: व्यक्ति के पास लौट आता है और तरकश में कभी तीर या बाण समाप्त नहीं होते। सबसे पहले ऐसा ही एक तीर राजा बलि के पास था।
गांडीव धनुष : कहते हैं कि गांडीव धनुष अलौकिक था। यह धनुष वरुण के पास था। वरुण ने इसे अग्निदेव को दे दिया था और अग्निदेव से अर्जुन को प्राप्त हुआ था। यह धनुष देव, दानव तथा गंधर्वों से अनंत वर्षों तक पूजित रहा था। वह किसी शस्त्र से नष्ट नहीं हो सकता था तथा अन्य लाख धनुषों की समता कर सकता था। जो भी इसे धारण करता था उसमें शक्ति का संचार हो जाता था।
अक्षय तरकश : अर्जुन के अक्षय तरकश के बाण कभी समाप्त नहीं होते थे। गति को तीव्रता प्रदान करने के लिए जो रथ अर्जुन को मिला, उसमें अलौकिक घोड़े जुते हुए थे जिसके शिखर के अग्र भाग पर हनुमानजी बैठे थे और शिखर पर कपि ध्वज लहराता था। इसी के साथ उस रक्ष में अन्य जानवर विद्यमान थे, जो भयानक गर्जना करते थे।
तदनंतर अग्निदेव ने खांडव वन को सब ओर से प्रज्वलित कर दिया। इन्द्र सहित सभी देवता खांडव वन को बचाने के लिए आए लेकिन उनका सामना कृष्ण और अर्जुन से हुआ। अंततोगत्वा सभी हार गए। खांडव वनदाह से तक्षक नाग, अश्वसेन, मायासुर तथा चार शांगर्क नामक पक्षी बच गए थे। इस वनदाह से अग्निदेव तृप्त हो गए तथा उनका रोग भी नष्ट हो गया।