मूलाधार चक्र

मूलाधार चक्र
आज हम आपको पहले चक्र अर्थात मूलाधार चक्र के बारे में बताएंगे
मूलाधार चक्र दो शब्दों से मिलकर बना है मूल प्लस आधार जहाँ पर मूल का अर्थ जड़ और आधार का अर्थ नींव होता है मनुष्य शरीर का निर्माण उसकी माँ के गर्भ से होता है तो उसकी जड़ें बही से होती है और उसका आधार भी बही है आपको पता ही होगा जी शिशु के मनुष्य रूप में आकार लेने से पहले वो मात्र एक मांस का गोला था धीरे धीरे वो मनुष्य शरीर धारण करता है
यह मनुष्य की रीढ़ की हड्डी के बिल्कुल नीचे स्थित होता है जिसके कारण इसे जड़ चक्र के नाम से भी जाना जाता है ये मानव चक्रों में सबसे पहला चक्र है और इसका भौतिक शरीर एक अभिन् न संबंध है
मूलाधार चक्र के देवता भगवान पशुपति महादेव के रूप में ध्यानावस्थित भगवान शिव है और इस चक्र का मंत्र लम् है इस चक्र का रंग लाल है मूलाधार चक्र का तत्व अर्थ अर्थात धरा अर्थ अर्थात धरा है इस चक्र को प्रतीकात्मक रूप में कमल के साथ चार पंखुड़ियों के रूप में दर्शाया जाता है जो अचेतन मन की चार भावनाएँ सूचित करती है चारों पंखुड़ियाँ इस चक्र में उत्पन्न होने वाले मन के चार तख्तों मानस बुद्धि चित्त और अहंकार की प्रतीक है इस चक्र का दूसरा प्रतीक चिन्ह उल्टा त्रिकोण है ये ब्रह्माण्ड की ऊर्जा खींचते चले आने का द्योतक है ये चेतना के ऊर्ध्व धर्म प्रसार का भी बोध कराता है जैसे किसी इमारत की बुनियाद सबसे महत्वपूर्ण होती है उसी तरह मूल आधार सबसे महत्वपूर्ण चक्र है अगर आप का मूल आधार मजबूत हो तो जीवन हो या मृत्यु आप स्थिर रहेंगे क्योंकि आप की नींव मजबूत है और बाकी चीजों को हम बाद में ठीक कर सकते हैं
मूलाधार चक्र के सकारात्मक गुण
उत्साह और विकास
मूलाधार चक्र के नकारात्मक गुण
सुस्ती निष्क्रियता आत्मकेंद्रित और विषयासक्ति

और मानव चेतना के बीच सीमा निर्धारित करने वाला माना जाता है अरे इसका संबंध अचेतन मन से है जिसमें पिछले जीवन के कर्म और अनुभव संचित रहते हैं कर्म सिद्धांत के अनुसार यह चक्र प्राणी के भावी प्रारब्ध निर्धारित करता है सभी चक्रों के कार्य भिन्न भिन्न होते हैं उसी प्रकार इस चक्र का कार्य भी आदित्य है ये चक्र स्वास्थ्य तथा भलाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण है चक्र है ऐसा माना जाता है कि पिछले जीवन की यादें तथा कार्य को इसी क्षेत्र में संग्रहित किया जाता है
अगर आप गर्भाधान के बाद मानव शरीर को देखें तो वह सिर्फ मांस का एक ही छोटा सा गोला होता है मांस का मिलना सा पिंड धीरे धीरे अपने आपको व्यवस्थित करके बह रूप धारण कर लेता है जो आज दिख रहा है इस खास तरीके से खुद को व्यवस्थित करने के लिए एक तरह का सॉफ्टवेयर होता है जिसे प्राणमय कोष कहा जाता है जिसे आप ऊर्जा शरीर भी कह सकते हैं
सबसे पहले ऊर्जा सैलरी का निर्माण होता है उसके अनुरूप भौतिक शरीर की रचना होती है अगर ऊर्जा शरीर में कोई विकृति हो तो वह भौतिक काया में भी प्रकट होंगी इसी वजह से हमारी सनातन संस्कृति में जब कोई स्त्री गर्भवती होती थी तो वह मंदिर जाकर वहाँ पर है आशीर्वाद लेती थी आशीर्वाद से ऊर्जा शरीर को प्रभावित करने की कोशिश की जाती थी अगर एक गर्भवती स्त्री के गर्भ में बहुत जीवंत अच्छी तरह से बना हुआ ऊर्जा शरीर है तो भाई एक बहुत सक्षम और योग मनुष्य को जन्म देगी
मूलाधारचक्र ऊर्जा शरीर की बुनियाद है आज कल लोग सोचते हैं कि मूल आधार सबसे निचला चक्र है इसलिए इसकी इतनी अहमियत नहीं है जो भी ये सोचता है की बुनियाद पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है वह दरअसल भ्रम में हैं जैसे किसी इमारत की बुनियाद सबसे महत्वपूर्ण होती है उसी तरह मूल आधार सबसे महत्वपूर्ण चक्र होता है जब हम योग करते हैं तो हम किसी और चीज़ से अधिक मूल आधार पर ध्यान देते हैं क्योंकि अगर आप की आपने इसे सुदृढ़ और स्थिर कर लिया तो बाकियों का निर्माण आसान हो जाता है अगर हम कमजोर नींव पर भवन खड़ा करने की कोशिश करें तो वह एक सर्कस की तरह हो जाएगा मानव जीवन के साथ ऐसा ही हुआ है रोजाना अपने आप को संतुलन और खुशहाली की एक स्थिति में बनाए रखना अधिकतर लोगों के लिए एक सर्कस है लेकिन अगर आप का मूल आधार मजबूत हो तो जीवन हो या मृत्यु आप स्थिर रहेंगे क्योंकि आप की नींव मजबूत है और बाकी चीजों को हम बाद में ठीक कर सकते हैं लेकिन अगर नींव डगमगा रही हो तो चिंता स्वाभाविक है
मूलाधार चक्र जिन व्यक्तियों का अत्यधिक सक्रिय होता है तब किसी मामले में वे छोटे से कारण की वजह से गुस्से में आक्रामक व नाराज हो जाते हैं व्यक्ति दूसरों को दादागिरी करना शुरू कर देता है और उसे वरीष्ठ लोगों का कहना मानने में मुश्किल हो जाती है जो लोग लालची होते हैं तथा भौतिक सांसारिक चीजों को अधिक महत्त्व देते होते हैं उनका मूलाधार चक्र अति सक्रिय होता है
जिनका मूलाधारचक्र कम सक्रिय होता है वह लोग अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं व्यक्ति अपने आप को स्थिर रखने में असमर्थ हो जाता है और बाहरी दुनिया से खुद को अलग कर देता है दैनिक कार्य पूरा करने में उनको कठिनाई होती है तथा संगठित रहने में परेशानी हो जाती है जो लोग शांत शर्मीले तथा अति बेचैन होते हैं उनका मूल चक्र असामान्य रूप से निष्क्रिय होता है
अनुचित तरीके से कार्य करने वाले मूलाधार चक्र की वजह से प्रो स्टेट की समस्याएं मोटापा घटिया बेरी काज पीठ के निचले भाग की समस्याएं कूल्हे की समस्याएं घुटनों में सूजन व खाने में अरुचि जैसी समस्याएं निर्माण हो जाता सकती है व्यक्ति की हड्डियों की संरचना कमजोर हो सकती है तथा उनकी शारीरिक संरचना आसक्त हो सकती
पीठ के निचले भाग की समस्याएं कूल्हे की समस्याएं घुटनों में सूजन व खाने में अरुचि जैसी समस्याएं निर्माण हो जाता सकती है व्यक्ति की हड्डियों की संरचना कमजोर हो सकती है तथा उनकी शारीरिक संरचना आसक्त हो सकती है इस चक्र द्वारा प्रजनन अंगों प्रतिरक्षा प्रणाली और बड़ी अमानत अली इन आवेदकों को नियंत्रित किया जाता है
इसी तरह मानसिक संतुलन या विवेक एक खूबसूरत चीज़ है लेकिन अगर आप पूरी तरह विवेकपूर्ण हो जाएंगे तो आप मृत व्यक्ति के बराबर हो जाएंगे अगर आप का मूल आधार मजबूत होगा तो अपनी इच्छानुसार कभी भी किसी भी क्षेत्र में शुरुआत करने और जो जोखिम उठाने की क्षमता स्वयं आपके पास आ जाएगी
जोखिम उठाने की क्षमता स्वयं आपके पास आ जाएगी जब हम संतुलन की बात करते हैं तो हम मानसिक संतुलन या विवेक की बात नहीं करते हम विवेक और पागलपन के बीच की उस जगह को खोजने की बात करते हैं जहाँ आप जाने की हिम्मत कर सकते हैं जोखिम ले सकते हैं पागलपन एक दुस्साहस है जब तक वह काबू में हो वह बहुत अद्भुत चीज़ है अगर आप काबू खो बैठे तो भय बहुत बदसूरत हो जाएगा जी
मूला मूलाधारचक्र अन्य सभी प्रमुख तथा छोटे चक्रों को जीवन ऊर्जा वितरित करता है जब मूलाधार चक्र संतुलित होता है तब व्यक्ति सवस्थ होता है तथा संपूर्ण स्वास्थ्य का अनुभव करता है वह स्त्री हो या पुरुष शारीरिक रूप से सक्रिय तथा निश्चय हो जाता है

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