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4.- देवों के देव महादेव : ब्रह्मा और इंद्र के काल में देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे।

दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। भगावान शिव को पूजने वाले देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी।
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तुरंत प्रसन्न होने वाले वरदानी शिव : शिव की महिमा का वर्णन पुराणों में मिलता है। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा को शापित कर विष्णु को वरदान दिया था। शिव ने भस्मासुर को जो वरदान दिया था उसके जाल में वे खुद ही फंस गए थे। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया था।

राक्षस हों, देवता हों या फिर कोई सामान्य इंसान, शिव ने कभी अपने भक्तों के साथ भेदभाव नहीं किया। अगर कोई सच्चे मन से उन्हें याद करता है तो वे बड़ी आसानी से उसे अपना बना लेते हैं और उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य, रावण आदि कई असुरों को उन्होंने वरदान दिया था। शिव का महत्व जितना वाममार्ग में है उतना ही दक्षिणमार्ग में भी है। शिव के बगैर मोक्ष की कामना असंभव है।
6.- नीलकंठ शिव :भगवान शिव के गल में विषधर सर्प विराजमान है। शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। इसे हलाहल भी कहते हैं। कालकूट बहुत ही भीषण विष था जिसके कारण धरती नष्ट हो जाती। यदि भगवान शिव वह संपूर्ण विष पूर्ण रूप से पी जाते तो क्या होता यह तो नहीं मालूम। लेकिन उस विष को पीने की क्षमता किसी में भी नहीं थी। भगवान शिव ने वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया। कंठ में धारण करने के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया। इसीलिए वे नीलकंठ कहलाए।
बहुत से विद्वान समुद्र मंथन की घटना को एक प्रतिकात्मक घटना मानते हैं जो कि गलत है। ऐसा मानकर वे हिन्दू धर्म की ऐतिहासिक घटनाओं को मिथक और काल्पनीक बनाना चाहते हैं। जबकि ऐसी घटना हुई थी और इसके सबूत भी हैं। कालकूट नामक एक पौधे का रस भी होता है जो अतिउग्र होता है। इसकी दवाई बनाई जाती है।
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सिर काटना और जोड़ना : भगवान शिव ने गणेश का सिरकाटकर उस पर हाथी का सिर लगा दिया था। राजा दक्ष का सिर उनके गण वीरभद्र ने काट दिया था लेकिन शिव ने बाद में दक्ष को क्षमा करते हुए उनके धड़ पर बकरे का सिर लगा दिया था।
इसी तरह उन्होंने जलंधर का भी सिर काट दिया था। तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली तीनों का सिर एक ही तीर से काट दिया था। उनके सिर को काटकर वे त्रिपुरासुर कहलाए। उन्होंने एक बार ब्रह्मा द्वारा झूठ बोले जाने के कारण उनका एक सिर काट दिया था। पहले ब्रह्मा के पांच सिर थे। पंचमुखी ब्रह्मा।
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शिव के पास थे ये अस्त्र और शस्त्र : यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।
शिव का धनुष पिनाक दुनिया का सबसे बड़ा और शक्तिशाली धनुष था। शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था जिसे कोई उठा नहीं सकता है। प्रभु श्रीराम ने इस धनुष को उठाकर इसे तोड़ दिया था। इसी तरह शिव का त्रिशुल भी कई शक्तियों से संपन्न था। शिव का खास अस्त्र पाशुपतास्त्र था, जिसकी शिक्षा उन्होंने परशुराम सहित अपने कई भक्तों को दी थी।
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शिव गण : भगवान शिव की सुरक्षा और उनके आदेश को मानने के लिए उनके गण सदैव तत्पर रहते हैं। उनके गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। भैरव दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से ‘वीरभद्र’ नामक गण उत्पन्न किया।

इस तरह उनके ये प्रमुख गण थे- भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं।